Sunday, February 1, 2009
पब संस्कृति बनाम भारतीय संस्कृति
प्रत्येक जन की अपनी अलग अलग राय इस विषय पर देखने और सुनने को मिलती है. कोई इसका पक्षधर है तो किसी के मतानुसार पब संस्कृति बिल्कुल भी भारतीय संस्कृति का अंग नही है. अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न हम लोगों के बीच में उभर कर आया है कि आखिर भारतीय संस्कृति क्या है और इसके सरंक्षण के ठेकेदार कोन है?
आज भारतीय सविधान ने हर किसी को अपनी मर्जी से अपना जीवन जीने का अधिकार दिया हुआ है. सभी लोग कहते है कि ये मेरी लाइफ है जिसे मैं जैसे चाहों उस ढंग से जी सकता हूँ , लेकिन साथ साथ में सविधान ने ये भी कहा है कि आपकी स्वतंत्रा वहा पर ख़तम हो जाती है जहा पर उससे किसी दूसरे को परेशानी का अनुभव होता है. शायद इस विषय पर हमारा ध्यान नही जाता.
अब बात आती है कि क्या पब संस्कृति को भारतीय समाज में मान्यता मिलनी चाहिए या पब संस्कृति भारतीय सभ्यता के लिए हानिकारक है? मेरी ब्याक्तिगत राय में पब संस्कृति न कभी भारतीय संस्कृति का अंग रही होगी और न कभी इसको भारतीय संस्कृति में शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए. हमारी अपनी संस्कृति अपने आप में अदुतीय है. विश्व में यदि कोई संस्कारित और पर हितकारी संस्कृति है तो वो है "भारतीय संस्कृति ". क्यों हम लोग अपनी संस्कृति को बिगाड़ने का काम कर रहे है?, क्यों हम लोग पश्चिमी संस्कृति में मिश्रित होना चाहते है. आज जो लोग २१वी सदी की दुहाई देते हुए कहते है लोग चाँद पर पहुच गए है और हम आज भी वही ४०-५० पहले वाली सोच पाले हुए है, बुजुर्गों की सोच पाले हुए है. ये राग आलापते हुए कि आज दुनिया विकास कर रही है, हम लोग विकास कर रहे है तो हमको अपनी सोच भी बदलनी चाहिए, हमें भी विकास करना चाहिए. मैं भी इस बात से इतेफाक रखता हूँ कि जरूर हमें भी विकास करना चाहिए किस क्षेत्र में- आर्थिक क्षेत्र में, बोधिक क्षेत्र में, तकनीकी के क्षेत्र में, हमें भी इतना विकास करना चाहिए कि कोई भी भूख से न मरे, प्यास से न मरे, तन ढकने के लिए सबको कपड़ा मिले. हमें ऐसा विकास चाहिए.
आर्थिक विकास और तकनीकी विकास की तो हम हमेशा बात करते रहते है लेकिन क्या कभी हमने सामाजिक विकास की बात की.क्या हमने कभी सोचा कि हमारा सामाजिक विकास किस प्रकार होना चाहिए. क्या आर्थिक दृष्टि से मजबूत होना ही विकास को परिभाषित करता है? क्या सामजिक मूल्यों का विकास में कोई योगदान नही है? जो लोग पब संस्कृति की बात कर रहे है मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूँ कि किसी भी पब में जाकर नृत्य करना, दारु नशा और विभिन्न प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन करके उसमे झूमना, ये किस विकास की बात हो रही है और ये कोंसी सभ्यता है?
जो आज हाई सोसाइटी के नाम पर समाज को बिगाड़ने की जो प्रथा चल रही है वो वास्तव में सोचनीय है. पहले जमाने और हमारे धार्मिक ग्रंथों में एक शब्द का प्रयोग बहुतायत में हुआ है वो है "उच्चकुल". इस उच्चकुल का प्राचीन में क्या अर्थ था और आज इसका क्या अर्थ हो गया है ये हम सभी लोग जानते है. लेकिन आज उच्चकुल ने हाई सोसाइटी का रूप ले लिया है और जो कि केवल पैसों से टोला जाता है. आज उसी को हाई सोसाइटी का माना जाता है जिसके पास बहुत सारा पैसा हो, जो लाखों रूपये के सूट बूट पहनता हो, जो आलिशान वातानुकूलित गाड़ियों में सफर करता हो, घूमता हो, जो होटल-बार में जाकर शराब पीता हो और वहा पर नाचने वाली मजबूर लड़कियों/औरतों पर पैसा उडेलता हो, बस यही तो हाई सोसाइटी है और यही से तो पब संस्कृति का जन्म हुआ है. इसी को तो विकास कहते है और २१वी सदी कहते है. चाहे उनमे वो मानवीय गुन हों या न हों जो कि वास्तव में एक उच्चकुल को परिभाषित करते है, लेकिन समाज में पैसे की बहुलता के कारण वो एक हाई सोसाइटी के नाम से जाने जाते है और जिसमे वो ख़ुद का सम्मान महसूस करते है.
अब प्रश्न आता है कि जो लोग पब में जाना चाहते है, शराब पीना चाहते है, नशा करने चाहते है तो उनको करने दो, इस पर समाज पर क्या असर पड़ेगा? मेरी दृष्टि में तो असर पड़ता है भाई, बहुत असर पड़ता है. एक नवजात शिशु की प्रथम पाठशाला उसका परिवार होता है, जो कुछ प्रारम्भ में वो अपने परिवार से सीखता है उसका चरित्र का उसी के अनुसार विकास होता है.जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है, स्कूल जाता है, आस पड़ोस में जाता है , समाज के बीच में जाता है तो वहा से वो बहुत कुछ सीखता है. कुछ अच्छी बातें भी सीखता है और कुछ बुरी बातें बी. ये एक शास्वित सत्य है कि हम बुरी चीजों के ओर बड़ी जल्दी आकृषित हो जाते है, बुरी चीजों को सीखने में कुछ ज्यादा वक्त नही लगता है, शायद उस समय हमको ये बोध नही होता है कि हमारे लिए बुरा क्या है और अच्छा, बस हमें उसमे कुछ आनंद की अनुभूति होती है और हम उसके पीछे दोड़ने लगते है लेकिन जब हमको ये आभास होता है कि अमुक चीज हमारे लिए हानिकारक है तो तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.
समाज क्या है? किसी समूह को ही तो हम समाज कहते है, चाहे वो मनुष्य का समाज हो या पशु -पक्षियों या कीडे मकोडों का समाज हो. हर किसी का अपना एक समाज होता है और उसी समाज में पल बढ़ कर वो आगे बढ़ता है . मनुष्य का समाज बाकि अन्य समाज से श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि मनुष्य में बुधि विवेक होता है और सबसे बड़ी बात ये है कि प्रकृति ने उसको एक वाणी यन्त्र दिया है जिसकी सहायता से वो अपनी बात अपने समाज के बीच में रखता है.
आज समाज में प्रतिश्पर्धा की दोड़ है, हर कोई हर किसी से आगे निकलना चाहता है और इस प्रतिश्पर्धा ने धीरे धीरे दिखावे का रूप ले लिया है. आज हर कोई अपने पड़ोसी के घर में झांकता है कि वहा पर क्या पाक रहा है, वो कैसे कपड़े पहन रहे है, कैसी गाड़ी में घूम रहे है उनका मकान कितना बड़ा है , वहा संगमरमर लगा हुआ है या सीमेंट, उनके बच्चे किन स्कूलों में पढ़ते है और कहा कहा घूमने जाते है और इन्ही चीजों को पाने की अपेक्षा वो अपने परिवार से भी करता है, चाहे वो इन चीजों को हासिल करने के लिए सक्षम हो या नही फ़िर भी उनकी इच्छा यही रहती है. अब जब मन में तृष्णा पैदा हो जाती है तो जब तक वो शांत न हो कैसे बैठा जाय?, और इन सभी चीजों को हासिल करने के लिए तब वो भूल जाता है कि उसके लिए अच्छा क्या है और बुरा क्या है, क्योंकि उसको तो समाज में अपना रूतबा दिखाना होता है. इससे आगे मुझे कहने की कोई आवश्यकता नही है. मैं जो कहना चाहता हूँ शायद आप लोग मेरा अभिप्राय समझ गए होंगे.
दूसरी एक बात जो इस पब और पश्चायता संस्कृति से उभरकर आती है वो है "अश्लीलता". बहुत से लोगों का तर्क होता है कि कैसे अश्लीलता को परिभाषित किया जाय और कोन इसके मानक निर्धारित करे. मेरा उन सभी लोगों से बस एक ही उत्तर है कि जो चीज हम अपने परिवार और बच्चों के साथ नही देख सकते है या जिनको देखने में हमको कुछ असहजता महसूस होती है, बस वही चीज अश्लील है. जिस चीज को करते हुए हम अपने बच्चों को नही देखना चाहते है बस वही अश्लीलता है. मेरी दृष्टि में तो अश्लीलता को परिभाषित करना बहुत आसान है, आप लोगों का पता नही.
आज विदेशी लोग हमारी संस्कृति सभ्यता को अपना रहे है और हम उनके पीछे भाग रहे है. क्यों ? इसका उदहारण आप ब्रिन्दावन जाकर देखो, हरिद्वार ऋषिकेश जाकर देखो, बहुत से विदेशी लोग राम राम कृष्ण कृष्ण गुनगुनाते हुए नजर आयेंगे. अब ये मत कहना कि राम -कृष्ण तो हिंदू देवता है, भारत में तो और भी धर्म के लोग रहते है. देवता सबका एक ही है बस रूप अनेक है. आज जो लोग पब संस्कृति के हिमायती है मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूँ कि उनमे से कितने लोग अपने बच्चों को रात के १२-१-२-३ बजे घर आते हुए देखना पसंद करेंगे, कितने लोग अपने बच्चों को नशे में झूमते हुए देखना पसंद करेंगे? शायद उत्तर हाँ में बहुत कम सुनने को मिलेगा, केवल हाई सोसाइटी (३० % ) को छोड़कर, वहा पर तो कुछ भी हो सकता है, पैसे के रूतबे पर.
जब पब संस्कृति की बात छिडी ही है तो यहाँ पर एक शब्द और उभरकर आता है वो है "प्रेम". प्रेम करना कोई बुरी बात नही है,सदियों से लोग प्रेम करते आए है लेकिन अपने उस प्रेम को प्रेम तक ही और मर्यादों के अन्दर तक सीमित रखा जाय तो वो अच्छा है. प्रेम का सार्वजनिक स्थानों में प्रदर्शन बिल्कुल भी शोभनीय नही है. अगर प्रेम सामाजिक दायरों और मर्यादा के अन्दर किया जाय तो उस प्रेम की हर कोई प्रसंशा करेगा. सामाजिक दायरे और मर्यादाएं हमें खुद निर्धारित करनी है.
बात पब संस्कृति की हो और मीडिया का नाम ना आए तो ये हो ही नही सकता. मुझे कभी कभी भारतीय गणतंत्र के चोथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया पर भी अफ़सोस होता है. शायद कभी कभी हमारा मीडिया अपने पथ और उधेश्य से विचलित हो जाता है, जब वो समाज के ठेकेदार, बुजुर्गों की पुराणी सोच, २१वी सदी के भारत की बात करता है. समाज के ठेकेदार कोई वर्ग विशेष नही है, समाज के ठेकेदार हम सभी है, अपने समाज को कैसे बचाया जाय, कैसे संस्कारित किया जाय, कैसे भाई चारे का पाठ सिखाया जाय, कैसे देश प्रेम की भावना विकसित की जाय और कैसे एक सभ्य समाज का निर्माण किया जाय उसकी नैतिक जिम्मेदारी समाज के हर वर्ग और ब्यक्ति की है.
एक और बात जो अक्सर हम लोग भूल जाते है वो है अहसास कराने की. बाल्मीकी रामायण और तुलसीदास जी के बारे में आप सभी लोग भली प्रकार से जानते है, दोनों ही बहुत बड़े विद्वान हुए है , लेकिन अगर दोनों के प्रारंभिक जीवन पर प्रकाश डालें तो उनको ये पता नही था कि उनमे क्या गुण है और क्या अवगुण , लेकिन जब उनको उनके गुणों का अहसास कराया गया तो दोनों ने ही इतिहास में अपना नाम अमर करवा दिया. शायद यदि तुलसी दास जी कि पत्नी उनको धित्कारती नही तो आज राम चरित मानस जैसा पवित्र ग्रन्थ पढने को नही मिलता. शायद यदि वो साधू लोग बाल्मीकी को ये नही बताते कि जो तू कर रहा है क्या इस पाप के हकदार तेरे परिवार वाले भी होंगे तेरे साथ या नही, जिनके लिए तू ये सब पाप कर रहा है तो आज हमको बाल्मीकि रामायण पढने को नही मिलती. दोनों ही शक्शों को अपनी अपनी विद्वता का ज्ञान तब हुआ जब उन्हें अहसास कराया गया. हनुमान जी को ये पता नही था कि वो समुद्र को पार करके लंका में प्रवेश कर सकते है,लेकिन जब उनको ये अहसास कराया गया कि तुममें ये शक्ति है कि तुम इस समुद्र को पार कर सकते हो तब वो अपनी मंजिल को पाने में सफल हुए.
इन दृष्टान्तों का अभिप्राय केवल ये है कि किसी किसी के गुणों या अवगुणों के बारे में बताना कोई बुरा काम नही है चाहे स्वयं उसमे वो गुण विद्यमान है कि नही . इसमे किसी भी प्रकार की हानि है . अब वो हमारी सोच पर निर्भर करता है कि हम उसको किस रूप में स्वीकार करते है .
अब जहा तक अपनी संस्कृति को बचाने के लिए कानून बनाने की बात है, मैं बिल्कुल इस विचार का समर्थक हूँ . देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए कानून का अपना एक अलग स्थान है. हम इसके महत्व को नही नकार सकते है. अगर देश की संस्कृति को बचाए रखना है तो इसके लिए कानूनों की भी सख्त आवश्यकता है .लेकिन हमेशा याद रखना चाहिए कि कानून हमेशा प्रजा के लिए बनाये जाते है और पालन भी हमको ही करने पड़ेंगे. जब तक हमारे मन में कानून के प्रति प्रेम, आदर और विश्वास नही होगा तब तक वो कानून हमारे लिए किसी काम के नही होते है.
अंत में मंगलोर की घटना पर मेरा अपना मत है कि श्री राम सेना द्वारा जो कार्य किया गया,
उसका तरीका बिल्कुल भी ग़लत था. किसी को हिंसा के बल शिक्षित और सचेत करना बिल्कुल भी शोभनीय नही है. यह जानकर खुशी हुई है कि श्री राम जैसे संगठन अपनी संस्कृति को लेकर काफी सजग है और सारे देशवाशियों को भी होना चाहिए लेकिन उनका जो काम करने का मार्ग है वो बिल्कुल शोभनीय नही है. अगर किसी को शिक्षित करना है तो अपने विचारों से करिए, अपने कार्यों से करिए, पश्चायात्य संस्कृति के गुन-अवगुणों को बताकर करिए, न किसी को डरा धमका कर और हिंसा के बल पर. हिंसा के बल पर न्याय दिलाना, ये तो हमारा सविधान भी स्वीकार नही करता है, इसलिए सबसे बड़ा हमारा अपना सविधान है, हमारा इसके प्रति सम्मान होना चाहिए और सविधान के अंतर्गत ही सारे काम होने चाहिए.
अंत मैं केवल यही कहूँगा कि अगर ३०% हाई सोसाइटी वाले लोगों को साथ लेकर भारत का विकास करना है तो तब जरूर हम पब संस्कृति को अपनी संस्कृति में शामिल कर सकते है लेकिन यदि ७०% सामान्य जन समूह को साथ में लेकर भारतवर्ष का विकास करना है तो तब हमें जरूर इस विषय पर सोचना चाहिए.
धन्यबाद
Monday, January 26, 2009
मराठी लादेन और भाड़े के टट्टू
आज सबसे पहले शुरुआत करूँगा मराठी लादेन और उसके भाड़े के टटौं की. आप लोग मेरा इशारा समझ ही गए होंगे, मैं किस उभरते लादेन की बात कर रहा हूँ, हाँ दोस्तों आपने ठीक पहिचाना मैं बात कर रहा हूँ महाराष्ट्र के उभरते हुए लादेन मान्यवर श्री राज ठाकरे जी का. आप लोग थोड़ा सा संकित हो रहे होंगे कि मैं राज ठाकरे जी को लादेन की उप संज्ञा के साथ साथ मान्यवर शब्द का भी प्रयोग कर रहा हूँ, वो इसलिए कि लादेन के साथ साथ वो एक राजनेता भी है और राजनेता का थोड़ा बहुत मान सम्मान भी तो होना चाहिए.
विस्तार में न जाकर मैं सीधे अपने मुख्या विन्दु पर आना चाहता हूँ. मराठी लादेन जी आज हमारा देश, हमारी जनता लोगों को जोड़ने की बात करती है, आपसी भाई चारा बढाने पर जोर दे रही है, विश्व बंधुत्व और वासुदेव कुटुम्बकम की जीवन शैली अपनाने पर जोर दे रही है और आप हमारे इस भाई चारे को तोड़ना चाहते हो? आप हो कोन? किस अधिकार से आप जाति वाद, भाषा वाद के आधार पर हमारे समाज को बाटना चाहते हो? किस आधार पर आप मासूम और निर्दोष लोगों का खून बहा रहे हो ? पहले आप अपना परिचय तो बताईये? आप हो कोन ? क्या आप एक राजनेता हो? अगर हाँ तो क्या आपको राजनेता की परिभाषा आती है? क्या आप एक समाज सुधारक हो? अगर हाँ तो क्या आपको समाज और सुधारक शब्द का अर्थ पता है? क्या आप आप एक सच्चे मराठी हो? यदि हाँ तो क्या आपको मराठी शब्द और इसका इतिहास मालूम है? नही राज ठाकरे जी आप में इनमे से न किसी का अर्थ जानते है और न इनमे से कोई भी गुण आप में विद्यमान है, तो आप हो कोन? अब मेरे पास केवल एक ही उत्तर है वो है आतंकवादी, सफ़ेद पोश आतंकवादी.
मुझे तो तरश आ रहा है अपने इस हिन्दुस्तान पर. हमारा ये हिन्दुस्तान किन किन आतंकवादियों से लडेगा. किन किन का सामना करेगा. विदेशी आतंकवादियों के हम हमेशा से ही निशाने पर रहे है लेकिन अब तो हमें स्वदेशी आतंकवादियों से भी जूझना पड़ रहा है, जो कि अपने ही लोगों के खून के प्यासे बने हुए है. कोई धर्म की आड़ में आतंकवाद फैला रहा तो कोई राजनीति की आड़ में आतंकवाद.
राजठाकरे जी आप कहते हो कि आपको अपने महाराष्ट्र की बहुत चिंता है, यहाँ के लोगों की बहुत चिंता है, लेकिन क्या आपने कभी अपने उन लोगों से जाकर पूछा कि वो क्या चाहते है, जो आप उनके नाम पर गुंडा गर्दी कर रहे है , क्या वो इससे खुश है कि नही? क्या आपको अपनी राजनीति करने का बस यही रास्ता मिला? अरे जरा बाहर सड़कों पर पैदल निकल देखिये, किसी गरीब की झोपडी में जाकर देखिये, किसी बुजुर्ग दम्पति के पास २ मिनट का समय ब्यतीत कर देखिये, किसी विकलांग का हाथ पकड़ कर देखिये, किसी बीमार ब्यक्ति से उसका हाल चाल पूछकर देखिये, तब आपको पता चलेगा की आपका मराठा प्रेम कितना सच्चा और कितना झूठा है. अरे आलिशान महलों सोने वाले और चांदी के बर्तनों में खाने वाले भला कैसे जानेंगे कि फुटपाथ पर सोना कितना कष्टदायी होता है.
राज ठाकरे जी की पार्टी /सेना जिसका नाम शायद कुछ इस प्रकार से है "नव निर्माण", शायद कुछ इसी प्रकार से है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि पार्टी/सेना कुछ निर्माण कार्य न करने के बजाय विनाश का काम कर रही है. देश को तोड़ने का काम, भाई चारा तोड़ने का काम, समाज को बाटने का काम. इस पार्टी /सेना पर तो ये सूक्ति भी ठीक से लागू नही होती "जतो नाम तथो गुण:" . अफ़सोस होता है ऐसे कर्याकर्तों को देखकर जो बिना सोचे समझे किसी के बहकावे में आकर कुछ भी कर जाते है. मैं इनको एक सच्चा कार्यकर्ता न कह कर भाड़े का टट्टू ही कहूँगा, क्योंकि एक सामाजिक कार्य करता वो होता है जो अपनी बुधि और विवेक के बल पर किसी कार्य को प्रोत्साहित और कार्यन्वित करता है. मैं इन भाड़े के टटौं से पूछना चाहता हूँ कि क्या कभी ख़ुद राज ठाकरे आप लोगों के साथ किसी हिंसक गतिविधि में शामिल हुए? क्या कभी उन्होंने किसी गैर मराठी को ख़ुद पत्थर और तमांचे मारे, किसी कि टैक्सी के शीशे तोडे, किसी की झुग्गी झोपडी थोडी, उत्तर है नही क्योंकि उसके पास १००-२०० रूपये में बिकने वाले भाडू के टट्टू बहुत आसानी से मिल जाते है. क्षमा करना दोस्तों भाषा कुछ अशिष्ट लग रही है, लेकिन अपने दिल के उदगार को ब्यक्त करने के लिए इन शब्दों का प्रयोग बहुत जरूरी है.
यदि मेरे ये शब्द मराठी लादेन और उसके भाड़े के टटौं तक पहुच रही है तो मेरी उनसे विनर्म प्रार्थना है कि बंद करो अपनी ये गुंडा गर्दी, देश और समाज को बाटने की गन्दी राजनीति, बंद करो भाषा और जाति धर्म के नाम पर हिंसा. क्योंकि हिन्दुस्तान एक प्रजातंत्र राष्ट है और यहाँ हर किसी को भारतीय सविधान के अनुसार जीने और बोलने का अधिकार है. देश से बड़ा कोई धर्म नही है, पहले हम हिन्दुस्तानी है और फ़िर मराठी, गुजराती, पंजाबी, पहाडी....और गैर मराठी.
मिस्टर लादेन जी दिल में तो बहुत कुछ है कहने के लिए लेकिन समय की कमी है. मैं न तो कोई राजनेता हूँ, न कोई समाज सुधारक और न कोई विद्वान कवि-लेखक. लेकिन चलते चलते आपको एक नसीहत जरूर देना चाहता हूँ यदि आपको सच में एक अच्छा राजनेता बनना है, समाज की सेवा करनी है तो महात्मा गाँधी, स्वामी विवेकानंद, सरदार बल्लभ भाई पटेल आदि ऐतिहासिक पुरुषों को अपना आदर्श बनाईये न कि ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादी को.
चलते चलते इन दो पंक्तियों के साथ आपके, आपकी नव निर्माण सेना और सम्पूर्ण भारतवाशियों की शुभ मंगल कामना करता हूँ.
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामय:
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, माँ कश्चिद् दुःख भाग भवेत्
Thursday, August 28, 2008
बिहार बाड़ पीडितों की सहायता करें
नमस्कार, जैसे कि आप लोगों को मालूम ही होगा कि बिहार में कोसी नदी में बाड आ जाने से वहा का जीवन अस्त-ब्यस्त हो गया है, लोगों के घर पानी में डूब गए है, फसलें नष्ट हो गई है, कई लोग अपनी जिंदगी गँवा चुके है और कई लोग जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे है. आशियाने डूब गए है, एक चलती फिरती जिंदगी अचानक सी रुक सी गई है, बिहार के बाड प्रभावित लोग कई प्रकार की परेशानियों से झूझ रहे है. इंसानियत के नाते हम लोगों को भी आज इस संकट की घड़ी में उन बाड प्रभावित लोगों के साथ उनकी मदद के लिए आगे आना चाहिए. यदि हम शारीरिक रूप से उनका साथ नही दे सकते है, तो आर्थिक रूप से हम उनकी कुछ न कुछ मदद जरूर कर सकते है. मेरा ब्याक्तिगत हम सभी लोगों से निवेदन है कि हमें भी इस प्राकृतिक आपदा में उन लोगों का साथ देना चाहिए. जिससे जितनी आर्थिक सहायता हो सकती है कृपया सभी लोग आगे आयें और इस मुश्किल की घड़ी में उन लोगों का हमसफर बनें.
आपका एक छोटा सा प्रयास (सहायता ) किसी का जीने का सहारा बन सकता है.
सभी लोगों से निवेदन है कि अपने ऑफिस और आस पड़ोस में भी लोगों को बाड पीड़ित लोगों की मदद करने के लिए प्रेरित करें.
धन्यबाद
सुभाष काण्डपाल
बद्री केदार उत्तराखंड
Wednesday, August 13, 2008
स्वतन्त्रता दिवस और रक्षा बंधन की हार्दिक शुभ कामनाएं
आप सभी लोगों को स्वतन्त्रता दिवस और रक्षा बंधन की हार्दिक शुभ कामनाएं
जन-गण-मन अधिनायक जय हे
भारत भाग्य-विधाता,
पंजाब-सिन्धु-गुजरात- मराठा -
द्राविड -उत्कल-बन्ग
विन्ध्य-हिमाचल-यमुना-गन्गा
उच्छल-जलधि-तरंग
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशीष मांगे,
गाहे तव जय-गाथा
जन-गण-मन-मंगलदायक जय हे
भारत-भाग्य- विधाता
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे
वन्दे मातरम्
सुजलाम् सुफलम् मलयजशीतलाम्
सस्यश्यामलाम् मातरम्
शुभ्रज्योत्स्नपुलकितयामिनिम्
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनिम्
सुहासिनीम् सुमधुरभाषिणीम्
सुखदाम् वरदाम् मातरम्
कोटिकोटिकण्ठकलकलनिनादकराले
कोटीकोटीभुजैधृतैखरकरवाले
के बले मा तुमि अबले
बहूबलधारिणीम् मतरम्
तुमि विद्या तुमि धर्म तुमि हृदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बाहु ते तुमि मा शक्ति,हृदये तुमि मा भक्ति
तोमाराइ प्रतिमा कडि मंदिरे मंदिरे,मातरम्
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादयिनी
नमामि त्वां नमामि कमलाम् अमलाम्
अतुलाम् सुलजाम्
सुफलाम् मातरम्
श्यामलाम् सरलाम् सुस्मिताम् भुषिताम्
धरणीम् भरणीम् मातरम्
वन्दे मातरम्
भारत माता की जय भारत माता की जय भारत माता की जय
जय हिंद
धन्याबाद
सुभाष काण्डपाल
Friday, August 8, 2008
हे भगवान् किसी को न दीजो ऐसा बुडापा
अब सवाल ये है कि क्या वो बुजुर्ग वास्तव में पागल था या भूख ने उसको पागलों जैसा बना दिया था. क्या उस दुकानदार का कहना बिल्कुल उचित था कि यदि इसको खाना देते है तो ये बार बार खाने की मांग करता है?. नही दोस्तों, सोचो यदि हम भूख से बहुत ब्याकुल है और यदि कोई हमें एक टुकडा रोटी को दे तो क्या वो एक रोटी को टुकडा हमारी भूख को तृप्त कर देगा? नही बल्कि वो हमारी भूख को और प्रज्जवलित करेगा जब तक कि हमें भरपेट भोजन न मिल जाय. वही स्तिथि उस बुजुर्ग की भी थी, यदि कोई उसे एक रोटी का टुकडा भी देता होगा तो उससे उसकी भूख शांत नही होती है, बल्कि और भी ज्यादा बदती होगी और इसीलिए वो बार बार खाने की मांग करता होगा. इसलिए दोस्तों मेरी नजर में पागल वो बुजुर्ग नही है, बल्कि उसकी भूख है, जिसने उसको पागलों जैसा बना दिया है. एक अकेला ही ऐसा बुजुर्ग नही है, आपको हजारों लाखों ऐसे कई लोग मिल जायेगे जो अपनी क्षुदा (भूख) पूर्ति करने के लिए पागलों की श्रेणी में गिने जाते है.
धन्य हो ऐसे पुत्र पुत्री जिन्होंने अपने माँ बाप को ऐसी अवस्था में छोड़ दिया है, उनके लिए मेरे पास शब्द नही है और अगर यदि उस बुजुर्ग के पास इस बुडापे के लिए कोई अपना सहारा ही नही है या था तो मैं भगवान् से यही प्रार्थना करूँगा कि हे भगवान् ना दीजो कभी किसी (मुझे) को ऐसा बुडापा.
तो दोस्तों क्या आप ऐसा बुडापा जीवन ब्यतीत करना चाहेंगे कि आपको २ जून की रोटी के लिए दर दर भटकना पड़े?
सुभाष काण्डपाल
बद्री केदार उत्तराखंड
Monday, July 28, 2008
गिरते नैतिक मूल्य
अगर मैं अपनी उम्र की युवा पीड़ी को उद्दहरण के तोर पर लेकर आगे बड़ों तो बचपन मैं दादा-दादियों द्वारा हमको अच्छी अच्छी से कहानियाँ सुनने को मिलती थी. कहते है कि जब बच्चा छोटा होता है तो उस समय उसका मस्तिष्क बिल्कुल शून्य होता है, आप उसको जैसे संस्कार और शिक्षा देंगे वो उसी राह पर आगे बढता है. अगर बाल्यकाल में बच्चे को ये शिक्षा दी जाती है कि बेटा चोरी करना बुरा काम है तो वो चोरी करने से पहले सो बार सोचेगा, क्योंकि उसको शिक्षा मिली हुई है कि चोरी करना बुरी बात है. बाल्यकाल में बच्चे को संस्कारित करने में घर के बुजुर्गों का, माता पिता का बहुत बड़ा हाथ होता है. जैसे मैंने कहा कि जब छोटे थे और गाँव के बुजुर्ग दादा-दादियों की संगत में कुछ पल ब्यतीत करते थे, तो वो हमको बहुत कुछ अच्छी अच्छी कहानियाँ सुनाया करते थे जिसका कुछ न कुछ प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क पर पड़ता था, उनमे से कुछ कहानिया प्रेरणादायी होती थी, कुछ परोपकारी होती थी, कुछ जीवों पर दया करने वाली होती थी, कुछ देवी देवितोँ की होती थी और कुछ क्षेत्रीय कहानिया होती थी और सबका उद्देश्य हमारे अन्दर अच्छे संस्कारों को डालने का होता था और जो कि हमें संस्कारित बनाए रखने में आज भी बहुत मदद करते है. आज भी यदि हमारे कदम अपने पथ से विचलित होने का प्रयास करते है तो वो पुरानी कही हुई बातें याद आज जाती है और जो हमें फ़िर से सही पथ पर ले जाने का प्रयास करती है.
मैंने किसी प्रत्रिका मैं पढ़ा था कि किसी ५ साल के बच्चे से किसी सम्मानीय ब्यक्ति ने दुर्गा माँ की फोटो की ओर इशारा करते हुए पूछा बेटा ये कोन है तो बच्चे का जवाब था लोयन वाली औरत, जो इस लोयन के ऊपर बैठी है, किसी दूसरे सम्मानीय ब्यक्ति ने गणेश भगवान् के बारे में पूछा तो बच्चा गणेश जी को...Elephant God.......संबोधित करते हुए पाया गया. अब बताओ इसमे उस बच्चे का कसूर ही क्या है? जब कभी भी उस परिवार के सदस्य ने उसको ये बताने की कोशिश नही की कि बेटा ये दुर्गा माता है जिनका वहां शेर है या ये गणेश भगवान् जी है जिनका मुह हाथी की सूंड जैसा होता है तो उसको कैसे पता चलता?
जब हम छोटे थे तो हमारे पास एक नैतिक शिक्षा की किताब होती थी जिनमे कि बहुत अच्छी अच्छी कहानिया होती थी जिनको पड़कर बहुत आनंद आता था और एक बार मन में उन जैसा बनने की तीव्र इच्छा होती थी, लेकिन शायद आजकल उस नैतिक शिक्षा की किताब का अर्थ ही बदल गया है, उसका कोई महत्व ही नही रह गया है. मुझे तो लग रहा है कि शायद आज वो नैतिक शिक्षा की किताब स्कूलों से गायब भी हो चुकी होगी.
आज आपके घरों में दुनिया भर की कोमिक्स का ढेर मिल जाएगा, कंप्यूटर गेम्स की दुनिया भर की सी डी मिल जाएँगी, फिल्मी गानों की दुनिया भर की कैसेट आपके बच्चे के कमरे में मिल जायेगी लेकिन सरदार भगत सिंह, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद आदि मनीषियों की प्रेरणा श्रोत कहानियो की किताब आपके बच्चे के स्कूल बैग से नदारद मिलेगी और यहाँ तक कि आप भी ये कोशिश कभी नही करेंगे कि आप अपने बच्चे को ऐसी किताबें खरीद कर लायें. पहले यदि हमारे माँ बाप ऐसी किताबें नही भी खरीदा करते थे तो इसकी कमी हमारे दादा-दादी और बुजुर्ग पूरा कर देते थे, लेकिन आज हमारे बुरुगों की क्या स्तिथि है ये हम सब लोग जानते है. आज हर माँ बाप की ये कोशिश रहती है कि उनके बच्चे उनके दादा-दादी से दूर रहे, यदि कभी दादा दादी ने बच्चे को डांटने की हिमाकत भी कर ली तो उल्टा उनको उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है.
शायद ही अब किसी बच्चे को वो दादा दादी की कहानिया सुनने को मिलती होंगी, वो लोरी वो गीत सुनने को मिलते होंगे और शायद न ही कोई माँ बाप के पास इतना समय है कि वो अपने बच्चे को संस्कारित होने के संस्कार दे सकें. आज महात्मा गांधी, भगत सिंह, विवेकनन्द, लाल बहादुर शास्त्री केवल या तो उनके जन्म दिवस के मोके पर ही याद किए जाते है या उनके निर्वाण दिवस पर, आज वो हमारे घरों से नदारद है, हमारे दादा-दादियों की कहानियो से नदारद है, हमारे माँ बाप की जुबान से बहुत दूर है, हमारे आस से दूर है और हमारे पड़ोस से दूर है. तो कैसे हम ये आशा कर सकते है कि हमारे बच्चों से अच्छे संस्कार आयें? अच्छे संस्कार देने के लिए हमारे पास तो समय नही है, जो उनको अच्छे संस्कार दे सकते थे उनको तो उपेक्षित किया जाता है, जिन पुस्तकों को पढने से उनको संस्कारित किया जा सकता है उनका स्थान कोमिक्स, खिलोने और कोम्प्टर गेम्स ने ले लिया है, तो कैसे हम ये आश कर सकते है.
इसके बारे में हमको ख़ुद सोचना चाहिए क्योंकि कल हमें भी किसी का माँ / बाप और दादा/दादी बनना है. हम ये निश्चय करते है कि हमारी संतान किस दिशा में जा रही है और हम उनको क्या संस्कार दे रहे है. इसका और कोई जिम्मेदार नही है, केवल हम ही है.
धन्यबाद
सुभाष काण्डपाल
बद्री केदार उत्तराखंड
Tuesday, May 20, 2008
क्या यही पशु प्रेम है ??
अरे आज वो उस कुत्ते की बात कर रहे है जो अपने मालिक के घर मे चारपाई और रजाई के अन्दर सोता है, जो खुशबू दार साबुन से नहाता है, जो वो भोजन करता है जो हम जैसे सामान्य परिवार के लोग नही कर पाते है, उसके लिए करुना भाव का पैदा होना, थोड़ा सा आश्चर्यजनक लगता है.
दोस्तो हो सकता है मैं अपने आप में ग़लत हूँ, मेरे सोचने का तरीका ग़लत हो, लेकिन में उन पशु प्रेमी संस्थाओं से कहना चाहता हूँ कि अगर सच्चे अर्थों में तुमको हमारे पालतू पशुओं की चिंता है तो सबसे पहले उनकी सहायता करो, उनकी सहायता के लिए आगे आओ, जिनको उनकी जरूरत है.
