<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2308345866569447342</id><updated>2011-11-06T11:14:25.189-08:00</updated><category term='बाबा रामदेव'/><category term='समाज  subhash kandpal uttarakhand'/><category term='गैरसैण'/><category term='baba ramdev'/><category term='marathi gair marathi vivaad'/><category term='courruption'/><category term='atankwad'/><category term='help for bihar'/><category term='happy independece day'/><category term='pub culture Vs Indian culture'/><category term='भ्रष्टाचार'/><category term='happy raksha bandhan'/><category term='uttarakhand'/><category term='bihar flood sufer'/><category term='subhash kandpal'/><title type='text'>नजर- समाज</title><subtitle type='html'>मेरी नजर से देखो</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://merinajar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://merinajar.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>सुभाष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16711640058971514851</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_7d4LakZ6MDc/R9TxpSMoVeI/AAAAAAAAAOo/OZsIM_AfXo0/S220/sck.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>10</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2308345866569447342.post-3707090576343018311</id><published>2011-01-31T03:32:00.000-08:00</published><updated>2011-01-31T03:33:09.317-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गैरसैण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='uttarakhand'/><title type='text'>सरकार अहिंसा की भाषा नहीं समझती है?</title><content type='html'>अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी स्वर्गीय श्री महात्मा गाँधी के इस राम राज्य और अहिंसा कल्पित राज्य में आज अहिंसा की भाषा कोई नहीं सुनता है. अहिंसा के मार्ग को अपनाते हुए यदि कोई अपने अधिकारों के लिए लड़ता है तो सरकार के कानों के परदे तक उनकी आवाज नहीं पहुचती है. इतिहास गवाह है. जब तक दंगे फसाद न हो, सड़कों पर हौ हल्ला न हो, बसों, ट्रेनों में तोड़ फोड़ न हो, चक्का जाम न हो, तब तक सरकार में चेतना का प्रवाह नहीं होता है. ये आज इस देश का दुर्भाग्य ही है कि गाँधी को अपना आदर्श बताने वाली हर एक राजनीतिक पार्टी उनके बताये गए सिधांतों से बहुत दूर है. उत्तराखंड की राजनीती में राजधानी गैरसैण मसले पर भी यही कुछ आगे होने वाला है. गैरसैण को एक राजनीतिक मुद्दा बनाकर उसकी उत्तराखंड की अस्मिता के साथ एक घृणित खेल खेला जा रहा है. जब तक शांत प्रिय प्रदर्शन होते रहेंगे, राजधानी गैरसैण मसले का कुछ नहीं होने वाला है. जब तक एक बार फिर से सम्पूर्ण उत्तराखंड जन समूह सड़कों पर नहीं उतरेगा, तोड़ फोड़ का रास्ता नहीं अपनाएगा तक तक कम से कम मेरी दृष्टि से तो राजधानी गैरसैण की कल्पना की ही नहीं जा सकती है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2308345866569447342-3707090576343018311?l=merinajar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://merinajar.blogspot.com/feeds/3707090576343018311/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2308345866569447342&amp;postID=3707090576343018311' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/3707090576343018311'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/3707090576343018311'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://merinajar.blogspot.com/2011/01/blog-post_31.html' title='सरकार अहिंसा की भाषा नहीं समझती है?'/><author><name>सुभाष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16711640058971514851</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_7d4LakZ6MDc/R9TxpSMoVeI/AAAAAAAAAOo/OZsIM_AfXo0/S220/sck.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2308345866569447342.post-2046579939881384217</id><published>2011-01-31T03:29:00.000-08:00</published><updated>2011-01-31T03:31:09.217-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाबा रामदेव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रष्टाचार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='courruption'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='baba ramdev'/><title type='text'>बाबा रामदेव की भ्रष्टाचार विरोधी भ्रष्ट योग राजनीती</title><content type='html'>आजकल बाबा रामदेव जनित भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की खूब चर्चा सुनने और दिखने को मिल रही है. बाबा रामदेव देश से भ्रष्टाचार मिटाने और विदेशों में जमा काले धन को वापिस लाने के लिए जगह जगह अपने अनुयायियों के साथ रेलियाँ निकाल रहे है. मुझे ये देखकर थोडा सा आश्चर्य होता है कि क्या ये वही राम देव बाबा जी हैं जिन्होंने कुछ दिन पहले देश की राजनीती में अपना एक वक्तब्य देकर तूफ़ान मचा दिया था कि किसी मंत्री ने उनसे रिश्वत की मांग की थी लेकिन आज तक बाबा जी ने उस ब्यक्ति का नाम जनता को नहीं बताया. जब रामदेव बाबा जी एक भ्रष्ट मंत्री का नाम जनता के सामने उजागर नहीं कर सकते है, जिसके कि वो खुद प्रत्यक्ष दर्शी थे तो क्या वो भारत से भ्रष्टाचार ख़ाक मिटा सकते है. असल में मुद्दा भ्रष्टाचार या विदेशों में छिपे काले धन का नहीं है, मुदा बाबा जी को सुर्ख़ियों में रहने का है. बाबा जी को सुर्ख़ियों में रहने की एक आदत से बन गयी है. भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की सहायता से वो केवल अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे है और कुछ नहीं. अगर बाबा जी इतने ही समाज हितैषी है तो जरूर उनको उस भ्रष्टाचारी नेता का नाम जनता के सामने लाना चाहिए था जिसने उनसे रिश्वत की मांग की थी लेकिन सचाई ये नहीं है सचाई पब्लिक का ध्यान अपनी और बटोरने का है. बाबा का ये दोहरा चरित्र कम से कम मेरे गले तो नहीं उतर रहा है. आज बाबा रामदेव का मकसद केवल अपना एक छत्र साम्राज्य करना चाहते है और इसको पाने के लिए वो किसी भी हद तक जा सकते है. इतिहास गवाह है कि हम लोगों ने हमेशा से धर्म गुरुरों को हमेशा से मान सम्मान दिया है, उनको अपने आँखों पर बिठाया है, चाहे वो किसी भी धर्म से सम्बन्ध रखते हो लेकिन इसके साथ साथ एक कटु सत्य ये भी देखने को मिला है कि उन्ही धर्म गुरुओं , साधू संत लोगों को हमारा (जनता) का हमेशा अपने मतलब के लिए गलत फायदा उठाया है और उसी पंक्ति में बाबा रामदेव भी आगे बढ़ रहे है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमेशा समता की बात करने वाले बाबा रामदेव के पंतजली योगपीठ और भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की सदस्यता फॉर्म का अवलोकन करें तो यह देखने को मिलता है कि स्वयं बाबा रामदेव ने अपने अनुयायियों को पूँजी के हिसाब से वर्गों में बांटा है. सबसे ज्यादा धन देने वाले को पतंजलि योग पीठ की तरफ से सबसे ज्यादा सुख सुविधाएँ प्रदान की जाती है, उस से थोडा कम देने वाले को उस से कम सुविधाएँ ...और ये क्रम बढता जाता है और हम जैसे गरीब तबके के लोगों के लिए बाबा रामदेव के पतंजलि योगपीठ में वो स्थान नहीं है जो एक बड़े पूंजीपति के लिए है. मैं बाबा रामदेव जी से पूछना चाहता हूँ कि ये आपका कैसा समता का सन्देश है, ये आपका कोनसा सन्देश है जिसकी आप हमेशा से रटना लगाए रहते है कि मेरे देश के सभी निवासी बराबर है और मेरे लिए न कोई बड़ा है और न कोई छोटा. भेद तो खुद आपके पतंजलि योगपीठ में   दिखाई देता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमेशा से लोगों को अरोग्यवान की शिक्षा देने वाले योगगुरु देश विदेशों में तो खूब अपने योग शिविर लगा रहे है, लेकिन आज हमारे देश में ऐसे कई ग्रामीण क्षेत्र है जहाँ आज भी कोई अस्पताल नहीं है, मूलभूत सुख सुविधाएँ नहीं है, जिनके पास न ही इलाज के लिए पैसे है और न ही इलाज करवाने के लिए अस्पताल. जिनको कि वास्तव में योग की शिक्षा की बहुत आवश्यकता है, बाबा रामदेव के पास उन लोगों के भी समय नहीं है, क्योंकि वह पर बाबा रामदेव जी का लाइव कैमरा नहीं पहुच सकता है और वो लोग बाबा रामदेव जी को इतना पैसा नहीं दे सकते है कि बाबा रामदेव उस क्षेत्र में अपना शिविर लगा सकें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा रामदेव ने अपने साम्राज्य को बढाने के लिए आधुनिक तकनीकों का भी सहारा लेना शुरू कर दिया है. बाबा रामदेव जी दावा करते है कि जो लोग उनके शिवरों में भाग नहीं ले सकते है वो उनकी वी सी डी,डी वी डी और योग की पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से अपने घरों में योग सीख सकते है और योग का लाभ ले सकते है लेकिन यदि इन वी सी डी,डी वी डी और पत्र पत्रिकाओं की कीमतों पर नजर डालते है तो एक सामान्य और गरीब तबका का वर्ग १० बार सोचेगा. यहाँ भी बाबा रामदेव की कॉरपोरेट चरित्र साफ़ दिखाई देता है. यही हाल बाबा रामदेव की आयुर्वैदिक दवाएयों का है. आज बाबा रामदेव की पतंजलि योगपीठ हमारी रसोई तक पहुँच गयी है लेकिन केवल एक विशेष वर्ग या कहें कि संपन वर्ग के लिए. यहाँ भी एक गरीब तबका बाबा रामदेव की दिव्या योग फार्मेसी का कुछ भी लाभ प्राप्त नहीं कर सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि आज बाबा रामदेव एक कॉरपोरेट हस्ती बन गए है और जिनका मकसद केवल अपना एक छत्र साम्राज्य स्थापित करना है, चाहे इसके लिए उनको राजनीति का सहारा लेना पड़े या आमजनता को बेवकूफ बनाने का.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी कवि की २ पंक्तियाँ याद आ रही है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अन्याय सहकर मौन रहना, ये बड़ा दुष्कर्म है&lt;br /&gt;न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दंड देना, धर्म है.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और बाबा रामदेव इतने बड़े भ्रष्टाचारियों का डाटाबेस अपने में छुपाये बैठे है, इससे बड़ा और दुष्कर्म क्या हो सकता है. यदि बाबा रामदेव को अपना मान सम्मान-पद प्रतिष्टा बनाये रखनी है तो बाबा रामदेव को अपने चरित्र में निष्पक्षता और पारदर्शिता लानी बहुत जरूरी है नहीं तो वो समय दूर नहीं है जब बाबा रामदेव भी उन साधु संतों की जमात में अपने को खड़े पायेंगे जिनकी कथनी कुछ और होती है और करनी कुछ और.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्याबाद&lt;br /&gt;सुभाष कांडपाल&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2308345866569447342-2046579939881384217?l=merinajar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://merinajar.blogspot.com/feeds/2046579939881384217/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2308345866569447342&amp;postID=2046579939881384217' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/2046579939881384217'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/2046579939881384217'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://merinajar.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='बाबा रामदेव की भ्रष्टाचार विरोधी भ्रष्ट योग राजनीती'/><author><name>सुभाष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16711640058971514851</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_7d4LakZ6MDc/R9TxpSMoVeI/AAAAAAAAAOo/OZsIM_AfXo0/S220/sck.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2308345866569447342.post-924477713316472254</id><published>2009-02-01T23:29:00.000-08:00</published><updated>2009-02-01T23:31:10.886-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='pub culture Vs Indian culture'/><title type='text'>पब संस्कृति बनाम भारतीय संस्कृति</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: 13pt; line-height: 1.3em;"&gt;पिछले दिनों मंगलोर के एक पब पर कुछ हिंसावादियों द्वारा लड़कियों की पिटाई का मामला आज भारतीय राजनीती और मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है . वास्तव में जो कुछ भी हुआ,उसका तरीका बहुत ही निंदनीय है लेकिन इस घटना ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है "क्या पब संस्कृति भारतीय संस्कृति का अंग है या नही " और भारतीय संस्कृति के सरंक्षण के ठेकेदार कोन है?. सचमुच एक सोचनीय विषय है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रत्येक जन की अपनी अलग अलग राय इस विषय पर देखने और सुनने को मिलती है. कोई इसका पक्षधर है तो किसी के मतानुसार पब संस्कृति बिल्कुल भी भारतीय संस्कृति का अंग नही है. अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न हम लोगों के बीच में उभर कर आया है कि आखिर भारतीय संस्कृति क्या है और इसके सरंक्षण के ठेकेदार कोन है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भारतीय सविधान ने हर किसी को अपनी मर्जी से अपना जीवन जीने का अधिकार दिया हुआ है. सभी लोग कहते है कि ये मेरी लाइफ है जिसे मैं जैसे चाहों उस ढंग से जी सकता हूँ , लेकिन साथ साथ में सविधान ने ये भी कहा है कि आपकी स्वतंत्रा वहा पर ख़तम हो जाती है जहा पर उससे किसी दूसरे को परेशानी का अनुभव होता है. शायद इस विषय पर हमारा ध्यान नही जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बात आती है कि क्या पब संस्कृति को भारतीय समाज में मान्यता मिलनी चाहिए या पब संस्कृति भारतीय सभ्यता के लिए हानिकारक है? मेरी ब्याक्तिगत राय में पब संस्कृति न कभी भारतीय संस्कृति का अंग रही होगी और न कभी इसको भारतीय संस्कृति में शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए. हमारी अपनी संस्कृति अपने आप में अदुतीय है. विश्व में यदि कोई संस्कारित और पर हितकारी संस्कृति है तो वो है "भारतीय संस्कृति ". क्यों हम लोग अपनी संस्कृति को बिगाड़ने का काम कर रहे है?, क्यों हम लोग पश्चिमी संस्कृति में मिश्रित होना चाहते है. आज जो लोग २१वी सदी की दुहाई देते हुए कहते है लोग चाँद पर पहुच गए है और हम आज भी वही ४०-५० पहले वाली सोच पाले हुए है, बुजुर्गों की सोच पाले हुए है. ये राग आलापते हुए कि आज दुनिया विकास कर रही है, हम लोग विकास कर रहे है तो हमको अपनी सोच भी बदलनी चाहिए, हमें भी विकास करना चाहिए. मैं भी इस बात से इतेफाक रखता हूँ कि जरूर हमें भी विकास करना चाहिए किस क्षेत्र में- आर्थिक क्षेत्र में, बोधिक क्षेत्र में, तकनीकी के क्षेत्र में, हमें भी इतना विकास करना चाहिए कि कोई भी भूख से न मरे, प्यास से न मरे, तन ढकने के लिए सबको कपड़ा मिले. हमें ऐसा विकास चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्थिक विकास और तकनीकी विकास की तो हम हमेशा बात करते रहते है लेकिन क्या कभी हमने सामाजिक विकास की बात की.क्या हमने कभी सोचा कि हमारा सामाजिक विकास किस प्रकार होना चाहिए. क्या आर्थिक दृष्टि से मजबूत होना ही विकास को परिभाषित करता है? क्या सामजिक मूल्यों का विकास में कोई योगदान नही है? जो लोग पब संस्कृति की बात कर रहे है मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूँ कि किसी भी पब में जाकर नृत्य करना, दारु नशा और विभिन्न प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन करके उसमे झूमना, ये किस विकास की बात हो रही है और ये कोंसी सभ्यता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो आज हाई सोसाइटी के नाम पर समाज को बिगाड़ने की जो प्रथा चल रही है वो वास्तव में सोचनीय है. पहले जमाने और हमारे धार्मिक ग्रंथों में एक शब्द का प्रयोग बहुतायत में हुआ है वो है "उच्चकुल". इस उच्चकुल का प्राचीन में क्या अर्थ था और आज इसका क्या अर्थ हो गया है ये हम सभी लोग जानते है. लेकिन आज उच्चकुल ने हाई सोसाइटी का रूप ले लिया है और जो कि केवल पैसों से टोला जाता है. आज उसी को हाई सोसाइटी का माना जाता है जिसके पास बहुत सारा पैसा हो, जो लाखों रूपये के सूट बूट पहनता हो, जो आलिशान वातानुकूलित गाड़ियों में सफर करता हो, घूमता हो, जो होटल-बार में जाकर शराब पीता हो और वहा पर नाचने वाली मजबूर लड़कियों/औरतों पर पैसा उडेलता हो, बस यही तो हाई सोसाइटी है और यही से तो पब संस्कृति का जन्म हुआ है. इसी को तो विकास कहते है और २१वी सदी कहते है. चाहे उनमे वो मानवीय गुन हों या न हों जो कि वास्तव में एक उच्चकुल को परिभाषित करते है, लेकिन समाज में पैसे की बहुलता के कारण वो एक हाई सोसाइटी के नाम से जाने जाते है और जिसमे वो ख़ुद का सम्मान महसूस करते है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब प्रश्न आता है कि जो लोग पब में जाना चाहते है, शराब पीना चाहते है, नशा करने चाहते है तो उनको करने दो, इस पर समाज पर क्या असर पड़ेगा? मेरी दृष्टि में तो असर पड़ता है भाई, बहुत असर पड़ता है. एक नवजात शिशु की प्रथम पाठशाला उसका परिवार होता है, जो कुछ प्रारम्भ में वो अपने परिवार से सीखता है उसका चरित्र का उसी के अनुसार विकास होता है.जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है, स्कूल जाता है, आस पड़ोस में जाता है , समाज के बीच में जाता है तो वहा से वो बहुत कुछ सीखता है. कुछ अच्छी बातें भी सीखता है और कुछ बुरी बातें बी. ये एक शास्वित सत्य है कि हम बुरी चीजों के ओर बड़ी जल्दी आकृषित हो जाते है, बुरी चीजों को सीखने में कुछ ज्यादा वक्त नही लगता है, शायद उस समय हमको ये बोध नही होता है कि हमारे लिए बुरा क्या है और अच्छा, बस हमें उसमे कुछ आनंद की अनुभूति होती है और हम उसके पीछे दोड़ने लगते है लेकिन जब हमको ये आभास होता है कि अमुक चीज हमारे लिए हानिकारक है तो तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाज क्या है? किसी समूह को ही तो हम समाज कहते है, चाहे वो मनुष्य का समाज हो या पशु -पक्षियों या कीडे मकोडों का समाज हो. हर किसी का अपना एक समाज होता है और उसी समाज में पल बढ़ कर वो आगे बढ़ता है . मनुष्य का समाज बाकि अन्य समाज से श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि मनुष्य में बुधि विवेक होता है और सबसे बड़ी बात ये है कि प्रकृति ने उसको एक वाणी यन्त्र दिया है जिसकी सहायता से वो अपनी बात अपने समाज के बीच में रखता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज समाज में प्रतिश्पर्धा की दोड़ है, हर कोई हर किसी से आगे निकलना चाहता है और इस प्रतिश्पर्धा ने धीरे धीरे दिखावे का रूप ले लिया है. आज हर कोई अपने पड़ोसी के घर में झांकता है कि वहा पर क्या पाक रहा है, वो कैसे कपड़े पहन रहे है, कैसी गाड़ी में घूम रहे है उनका मकान कितना बड़ा है , वहा संगमरमर लगा हुआ है या सीमेंट, उनके बच्चे किन स्कूलों में पढ़ते है और कहा कहा घूमने जाते है और इन्ही चीजों को पाने की अपेक्षा वो अपने परिवार से भी करता है, चाहे वो इन चीजों को हासिल करने के लिए सक्षम हो या नही फ़िर भी उनकी इच्छा यही रहती है. अब जब मन में तृष्णा पैदा हो जाती है तो जब तक वो शांत न हो कैसे बैठा जाय?, और इन सभी चीजों को हासिल करने के लिए तब वो भूल जाता है कि उसके लिए अच्छा क्या है और बुरा क्या है, क्योंकि उसको तो समाज में अपना रूतबा दिखाना होता है. इससे आगे मुझे कहने की कोई आवश्यकता नही है. मैं जो कहना चाहता हूँ शायद आप लोग मेरा अभिप्राय समझ गए होंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी एक बात जो इस पब और पश्चायता संस्कृति से उभरकर आती है वो है "अश्लीलता". बहुत से लोगों का तर्क होता है कि कैसे अश्लीलता को परिभाषित किया जाय और कोन इसके मानक निर्धारित करे. मेरा उन सभी लोगों से बस एक ही उत्तर है कि जो चीज हम अपने परिवार और बच्चों के साथ नही देख सकते है या जिनको देखने में हमको कुछ असहजता महसूस होती है, बस वही चीज अश्लील है. जिस चीज को करते हुए हम अपने बच्चों को नही देखना चाहते है बस वही अश्लीलता है. मेरी दृष्टि में तो अश्लीलता को परिभाषित करना बहुत आसान है, आप लोगों का पता नही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज विदेशी लोग हमारी संस्कृति सभ्यता को अपना रहे है और हम उनके पीछे भाग रहे है. क्यों ? इसका उदहारण आप ब्रिन्दावन जाकर देखो, हरिद्वार ऋषिकेश जाकर देखो, बहुत से विदेशी लोग राम राम कृष्ण कृष्ण गुनगुनाते हुए नजर आयेंगे. अब ये मत कहना कि राम -कृष्ण तो हिंदू देवता है, भारत में तो और भी धर्म के लोग रहते है. देवता सबका एक ही है बस रूप अनेक है. आज जो लोग पब संस्कृति के हिमायती है मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूँ कि उनमे से कितने लोग अपने बच्चों को रात के १२-१-२-३ बजे घर आते हुए देखना पसंद करेंगे, कितने लोग अपने बच्चों को नशे में झूमते हुए देखना पसंद करेंगे? शायद उत्तर हाँ में बहुत कम सुनने को मिलेगा, केवल हाई सोसाइटी (३० % ) को छोड़कर, वहा पर तो कुछ भी हो सकता है, पैसे के रूतबे पर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब पब संस्कृति की बात छिडी ही है तो यहाँ पर एक शब्द और उभरकर आता है वो है "प्रेम". प्रेम करना कोई बुरी बात नही है,सदियों से लोग प्रेम करते आए है लेकिन अपने उस प्रेम को प्रेम तक ही और मर्यादों के अन्दर तक सीमित रखा जाय तो वो अच्छा है. प्रेम का सार्वजनिक स्थानों में प्रदर्शन बिल्कुल भी शोभनीय नही है. अगर प्रेम सामाजिक दायरों और मर्यादा के अन्दर किया जाय तो उस प्रेम की हर कोई प्रसंशा करेगा. सामाजिक दायरे और मर्यादाएं हमें खुद निर्धारित करनी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात पब संस्कृति की हो और मीडिया का नाम ना आए तो ये हो ही नही सकता. मुझे कभी कभी भारतीय गणतंत्र के चोथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया पर भी अफ़सोस होता है. शायद कभी कभी हमारा मीडिया अपने पथ और उधेश्य से विचलित हो जाता है, जब वो समाज के ठेकेदार, बुजुर्गों की पुराणी सोच, २१वी सदी के भारत की बात करता है. समाज के ठेकेदार कोई वर्ग विशेष नही है, समाज के ठेकेदार हम सभी है, अपने समाज को कैसे बचाया जाय, कैसे संस्कारित किया जाय, कैसे भाई चारे का पाठ सिखाया जाय, कैसे देश प्रेम की भावना विकसित की जाय और कैसे  एक सभ्य समाज का निर्माण किया जाय उसकी नैतिक जिम्मेदारी समाज के हर वर्ग और ब्यक्ति की है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और बात जो अक्सर हम लोग भूल जाते है वो है अहसास कराने की. बाल्मीकी रामायण और तुलसीदास जी के बारे में आप सभी लोग भली प्रकार से जानते है, दोनों ही बहुत बड़े विद्वान हुए है , लेकिन अगर दोनों के प्रारंभिक जीवन पर प्रकाश डालें तो उनको ये पता नही था कि उनमे क्या गुण है और क्या अवगुण , लेकिन जब उनको उनके गुणों का अहसास कराया गया तो दोनों ने ही इतिहास में अपना नाम अमर करवा दिया. शायद यदि तुलसी दास जी कि पत्नी उनको धित्कारती नही तो आज राम चरित मानस जैसा पवित्र ग्रन्थ पढने को नही मिलता. शायद यदि वो साधू लोग बाल्मीकी को ये नही बताते कि जो तू कर रहा है क्या इस पाप के हकदार तेरे परिवार वाले भी होंगे तेरे साथ या नही, जिनके लिए तू ये सब पाप कर रहा है तो आज हमको बाल्मीकि रामायण पढने को नही मिलती. दोनों ही शक्शों  को अपनी अपनी विद्वता का ज्ञान तब हुआ जब उन्हें अहसास कराया गया. हनुमान जी को ये पता नही था कि वो समुद्र को पार करके लंका में प्रवेश कर सकते है,लेकिन जब उनको ये अहसास कराया गया कि तुममें ये शक्ति है कि तुम इस समुद्र को पार कर सकते हो तब वो अपनी मंजिल को पाने में सफल हुए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दृष्टान्तों का अभिप्राय केवल ये है कि किसी किसी के गुणों या अवगुणों के बारे में बताना कोई बुरा काम नही है चाहे स्वयं  उसमे वो गुण विद्यमान है कि नही . इसमे किसी भी प्रकार की हानि है . अब वो हमारी सोच पर निर्भर करता है कि हम उसको किस रूप में स्वीकार करते है .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जहा तक अपनी संस्कृति को बचाने के लिए कानून बनाने की बात है, मैं बिल्कुल इस विचार का समर्थक हूँ . देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए कानून का अपना एक अलग स्थान  है. हम इसके महत्व  को नही नकार  सकते है. अगर देश की संस्कृति को बचाए  रखना है तो इसके लिए कानूनों की भी सख्त आवश्यकता  है .लेकिन हमेशा याद रखना चाहिए कि कानून हमेशा प्रजा के लिए बनाये जाते है और पालन भी हमको ही करने पड़ेंगे. जब तक हमारे मन में कानून के प्रति प्रेम, आदर और विश्वास नही  होगा तब तक वो कानून हमारे लिए किसी काम के नही होते है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत में मंगलोर की घटना पर मेरा अपना मत है कि श्री राम सेना द्वारा जो कार्य किया गया,&lt;br /&gt;उसका तरीका बिल्कुल भी ग़लत था. किसी को हिंसा के बल शिक्षित और सचेत करना बिल्कुल भी शोभनीय नही है. यह जानकर खुशी हुई है कि श्री राम जैसे संगठन अपनी संस्कृति को लेकर काफी सजग है और सारे देशवाशियों को भी होना चाहिए लेकिन उनका जो काम करने का मार्ग है वो बिल्कुल शोभनीय नही है. अगर किसी को शिक्षित करना है तो अपने विचारों से करिए, अपने कार्यों से करिए, पश्चायात्य संस्कृति के गुन-अवगुणों को बताकर करिए, न किसी को डरा धमका कर और हिंसा के बल पर. हिंसा के बल पर न्याय दिलाना, ये तो हमारा सविधान भी स्वीकार नही करता है, इसलिए सबसे बड़ा हमारा अपना सविधान है, हमारा इसके प्रति सम्मान होना चाहिए और सविधान के अंतर्गत ही सारे काम होने चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत मैं केवल यही कहूँगा कि अगर&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; ३०% &lt;/span&gt;हाई सोसाइटी वाले लोगों को साथ लेकर भारत का विकास करना है तो तब जरूर हम पब संस्कृति को अपनी संस्कृति में शामिल कर सकते है लेकिन यदि &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;७०% &lt;/span&gt;सामान्य जन समूह को साथ में लेकर भारतवर्ष का विकास करना है तो तब हमें जरूर इस विषय पर सोचना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्यबाद &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2308345866569447342-924477713316472254?l=merinajar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://merinajar.blogspot.com/feeds/924477713316472254/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2308345866569447342&amp;postID=924477713316472254' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/924477713316472254'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/924477713316472254'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://merinajar.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='पब संस्कृति बनाम भारतीय संस्कृति'/><author><name>सुभाष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16711640058971514851</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_7d4LakZ6MDc/R9TxpSMoVeI/AAAAAAAAAOo/OZsIM_AfXo0/S220/sck.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2308345866569447342.post-8226198029983102293</id><published>2009-01-26T22:15:00.000-08:00</published><updated>2009-01-27T05:20:21.472-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='marathi gair marathi vivaad'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='atankwad'/><title type='text'>मराठी लादेन और भाड़े  के टट्टू</title><content type='html'>अगर आज ओसामा बिन लादेन का नाम कही पर याद किया जाता है तो आतंकवाद शब्द अपने आप अपने आप वहा पर जुड़ जाता है. हम सबको पता है कि आतंकवाद और ओसामा बिन लादेन का चोली दामन का साथ है, बिना आतंकवाद के न तो लादेन को याद किया जाएगा और न लादेन के बिना आतंकवाद. पूरा विश्वास लादेन के केवल नाम लेने से ही काँप जाता है. चलो छोडो मैं आज विश्वब्यापी लादेन की बात नही करता हूँ, मैं एक भारतवासी हूँ तो आज भारत के लादेन की बात करता हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज सबसे पहले शुरुआत करूँगा मराठी लादेन और उसके भाड़े के टटौं की. आप लोग मेरा इशारा समझ ही गए होंगे, मैं किस उभरते लादेन की बात कर रहा हूँ, हाँ दोस्तों आपने ठीक पहिचाना मैं बात कर रहा हूँ महाराष्ट्र के उभरते हुए लादेन मान्यवर श्री राज ठाकरे जी का. आप लोग थोड़ा सा संकित हो रहे होंगे कि मैं राज ठाकरे जी को लादेन की उप संज्ञा के साथ साथ मान्यवर शब्द का भी प्रयोग कर रहा हूँ, वो इसलिए कि लादेन के साथ साथ वो एक राजनेता भी है और राजनेता का थोड़ा बहुत मान सम्मान भी तो होना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विस्तार में न जाकर मैं सीधे अपने मुख्या विन्दु पर आना चाहता हूँ. मराठी लादेन जी आज हमारा देश, हमारी जनता लोगों को जोड़ने की बात करती है, आपसी भाई चारा बढाने पर जोर दे रही है, विश्व बंधुत्व और वासुदेव कुटुम्बकम की जीवन शैली अपनाने पर जोर दे रही है और आप हमारे इस भाई चारे को तोड़ना चाहते हो? आप हो कोन? किस अधिकार से आप जाति वाद, भाषा वाद के आधार पर हमारे समाज को बाटना चाहते हो? किस आधार पर आप मासूम और निर्दोष लोगों का खून बहा रहे हो ? पहले आप अपना परिचय तो बताईये? आप हो कोन ? क्या आप एक राजनेता हो? अगर हाँ तो क्या आपको राजनेता की परिभाषा आती है? क्या आप एक समाज सुधारक हो? अगर हाँ तो क्या आपको समाज और सुधारक शब्द का अर्थ पता है? क्या आप आप एक सच्चे मराठी हो? यदि हाँ तो क्या आपको मराठी शब्द और इसका इतिहास मालूम है? नही राज ठाकरे जी आप में इनमे से न किसी का अर्थ जानते है और न इनमे से कोई भी गुण आप में विद्यमान है, तो आप हो कोन? अब मेरे पास केवल एक ही उत्तर है वो है आतंकवादी, सफ़ेद पोश आतंकवादी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे तो तरश आ रहा है अपने इस हिन्दुस्तान पर. हमारा ये हिन्दुस्तान किन किन आतंकवादियों से लडेगा. किन किन का सामना करेगा. विदेशी आतंकवादियों के हम हमेशा से ही निशाने पर रहे है लेकिन अब तो हमें स्वदेशी आतंकवादियों से भी जूझना पड़ रहा है, जो कि अपने ही लोगों के खून के प्यासे बने हुए है. कोई धर्म की आड़ में आतंकवाद फैला रहा तो कोई राजनीति की आड़ में आतंकवाद.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजठाकरे जी आप कहते हो कि आपको अपने महाराष्ट्र की बहुत चिंता है, यहाँ के लोगों की बहुत चिंता है, लेकिन क्या आपने कभी अपने उन लोगों से जाकर पूछा कि वो क्या चाहते है, जो आप उनके नाम पर गुंडा गर्दी कर रहे है , क्या वो इससे खुश है कि नही? क्या आपको अपनी राजनीति करने का बस यही रास्ता मिला? अरे जरा बाहर सड़कों पर पैदल निकल देखिये, किसी गरीब की झोपडी में जाकर देखिये, किसी बुजुर्ग दम्पति के पास २ मिनट का समय ब्यतीत कर देखिये, किसी विकलांग का हाथ पकड़ कर देखिये, किसी बीमार ब्यक्ति से उसका हाल चाल पूछकर देखिये, तब आपको पता चलेगा की आपका मराठा प्रेम कितना सच्चा और कितना झूठा है. अरे आलिशान महलों सोने वाले और चांदी के बर्तनों में खाने वाले भला कैसे जानेंगे कि फुटपाथ पर सोना कितना कष्टदायी  होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज ठाकरे जी की पार्टी /सेना जिसका नाम शायद कुछ इस प्रकार से है "नव निर्माण", शायद कुछ इसी प्रकार से है, लेकिन अफ़सोस की बात है  कि पार्टी/सेना कुछ निर्माण कार्य न करने के बजाय विनाश का काम कर रही है. देश को तोड़ने का काम, भाई चारा तोड़ने का काम, समाज को बाटने का काम. इस पार्टी /सेना पर तो ये सूक्ति भी ठीक से लागू नही होती "जतो नाम तथो गुण:" . अफ़सोस होता है ऐसे कर्याकर्तों को देखकर जो बिना सोचे समझे किसी के बहकावे में आकर कुछ भी कर जाते है. मैं इनको एक सच्चा कार्यकर्ता न कह कर भाड़े का टट्टू ही कहूँगा, क्योंकि एक सामाजिक कार्य करता वो होता है जो अपनी बुधि और विवेक के बल पर किसी कार्य को प्रोत्साहित और कार्यन्वित करता है. मैं इन भाड़े के टटौं से पूछना चाहता हूँ कि क्या कभी ख़ुद राज ठाकरे आप लोगों के साथ किसी हिंसक गतिविधि में शामिल हुए? क्या कभी उन्होंने किसी गैर मराठी को ख़ुद पत्थर और तमांचे मारे, किसी कि टैक्सी के शीशे तोडे, किसी की झुग्गी झोपडी थोडी, उत्तर है नही क्योंकि उसके पास १००-२०० रूपये में बिकने वाले भाडू के टट्टू बहुत आसानी से मिल जाते है. क्षमा करना दोस्तों भाषा कुछ अशिष्ट लग रही है, लेकिन अपने दिल के उदगार को ब्यक्त करने के लिए इन शब्दों का प्रयोग बहुत जरूरी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि मेरे ये शब्द मराठी लादेन और उसके भाड़े के टटौं तक पहुच रही है तो मेरी उनसे विनर्म प्रार्थना है कि बंद करो अपनी ये गुंडा गर्दी, देश और समाज को बाटने की गन्दी राजनीति, बंद करो भाषा और  जाति धर्म के नाम पर हिंसा. क्योंकि हिन्दुस्तान एक प्रजातंत्र राष्ट है और यहाँ हर किसी को भारतीय सविधान के अनुसार जीने और बोलने का अधिकार है. देश से बड़ा कोई धर्म नही है, पहले हम हिन्दुस्तानी है और फ़िर मराठी, गुजराती, पंजाबी, पहाडी....और गैर मराठी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिस्टर लादेन जी दिल में तो बहुत कुछ है कहने के लिए लेकिन समय की कमी है. मैं न तो कोई राजनेता हूँ, न कोई समाज सुधारक और न कोई विद्वान कवि-लेखक. लेकिन चलते चलते आपको एक नसीहत जरूर देना चाहता हूँ यदि आपको सच में एक अच्छा राजनेता बनना है, समाज की सेवा करनी है तो महात्मा गाँधी, स्वामी विवेकानंद, सरदार बल्लभ भाई पटेल आदि ऐतिहासिक पुरुषों को अपना आदर्श बनाईये न कि ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादी को.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलते चलते इन दो पंक्तियों के साथ आपके, आपकी नव निर्माण सेना     और सम्पूर्ण भारतवाशियों की शुभ मंगल कामना करता हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामय:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, माँ कश्चिद् दुःख भाग भवेत् &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2308345866569447342-8226198029983102293?l=merinajar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://merinajar.blogspot.com/feeds/8226198029983102293/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2308345866569447342&amp;postID=8226198029983102293' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bihar flood sufer'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='help for bihar'/><title type='text'>बिहार बाड़ पीडितों की सहायता करें</title><content type='html'>आदरणीय मित्रों,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नमस्कार, जैसे कि आप लोगों को मालूम ही होगा कि बिहार में कोसी नदी में बाड आ जाने से वहा का जीवन अस्त-ब्यस्त हो गया है, लोगों के घर पानी में डूब गए है, फसलें नष्ट हो गई है, कई लोग अपनी जिंदगी गँवा चुके है और कई लोग जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे है. आशियाने डूब गए है,  एक चलती फिरती जिंदगी अचानक सी  रुक सी गई है, बिहार के बाड प्रभावित लोग कई प्रकार की परेशानियों से झूझ रहे है. इंसानियत के नाते हम लोगों को भी आज इस संकट की घड़ी में उन बाड प्रभावित लोगों के साथ उनकी मदद के लिए आगे आना चाहिए. यदि हम शारीरिक रूप से  उनका साथ नही दे सकते है, तो आर्थिक रूप से हम उनकी कुछ न कुछ मदद जरूर कर सकते है. मेरा ब्याक्तिगत हम सभी लोगों से निवेदन है कि हमें भी इस प्राकृतिक आपदा में उन लोगों का साथ देना चाहिए. जिससे जितनी आर्थिक सहायता हो सकती है कृपया सभी लोग आगे आयें और इस मुश्किल की घड़ी में उन लोगों का हमसफर बनें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;आपका एक छोटा सा प्रयास (सहायता ) किसी का जीने का सहारा बन सकता है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; सभी लोगों से निवेदन है कि अपने ऑफिस और आस पड़ोस में भी लोगों को बाड पीड़ित लोगों की मदद करने के लिए प्रेरित करें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्यबाद&lt;br /&gt;सुभाष काण्डपाल&lt;br /&gt;बद्री केदार उत्तराखंड&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2308345866569447342-5548549326894555861?l=merinajar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://merinajar.blogspot.com/feeds/5548549326894555861/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2308345866569447342&amp;postID=5548549326894555861' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/5548549326894555861'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/5548549326894555861'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://merinajar.blogspot.com/2008/08/blog-post_28.html' title='बिहार बाड़ पीडितों की सहायता करें'/><author><name>सुभाष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16711640058971514851</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_7d4LakZ6MDc/R9TxpSMoVeI/AAAAAAAAAOo/OZsIM_AfXo0/S220/sck.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2308345866569447342.post-9098169615565015351</id><published>2008-08-13T23:08:00.000-07:00</published><updated>2008-08-13T23:12:35.037-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='happy independece day'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='subhash kandpal'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='happy raksha bandhan'/><title type='text'>स्वतन्त्रता दिवस और रक्षा बंधन की हार्दिक शुभ कामनाएं</title><content type='html'>&lt;div&gt; &lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:navy;"  &gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-family:Mangal;color:navy;"   lang="HI"&gt;आप सभी लोगों को स्वतन्त्रता दिवस और रक्षा बंधन की हार्दिक शुभ  कामनाएं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&lt;span style=";font-family:Arial;color:navy;"  &gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-family:Arial;color:navy;"  &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style=";font-family:Arial;font-size:100%;color:navy;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Arial;color:navy;"  &gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style=";font-family:Arial;font-size:100%;color:navy;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Arial;color:navy;"  &gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:85%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;जन-गण-मन  अधिनायक जय हे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;भारत  भाग्य-विधाता&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;,&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;पंजाब-सिन्धु-गुजरात- मराठा  -&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;द्राविड  -उत्कल-बन्ग&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;विन्ध्य-हिमाचल-यमुना-गन्गा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;उच्छल-जलधि-तरंग&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;तव शुभ नामे  जागे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;तव शुभ आशीष  मांगे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;,&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;गाहे तव  जय-गाथा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;जन-गण-मन-मंगलदायक जय  हे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;भारत-भाग्य-  विधाता&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;जय हे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;जय  हे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;,  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;जय हे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;,&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:green;"   lang="HI"&gt;जय जय जय जय  हे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;color:green;"&gt;&lt;span style="color:green;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style=";font-family:Times New Roman;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-size:12;color:green;"  &gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style=";font-family:Times New Roman;font-size:100%;color:green;"   &gt;&lt;span style=";font-size:12;color:green;"  &gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;वन्दे  मातरम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;सुजलाम् सुफलम् मलयजशीतलाम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;सस्यश्यामलाम् मातरम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;शुभ्रज्योत्स्नपुलकितयामिनिम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनिम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;सुहासिनीम् सुमधुरभाषिणीम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;सुखदाम् वरदाम् मातरम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;कोटिकोटिकण्ठकलकलनिनादकराले&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;कोटीकोटीभुजैधृतैखरकरवाले&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;के बले मा तुमि अबले&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;बहूबलधारिणीम् मतरम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;तुमि विद्या तुमि धर्म तुमि हृदि तुमि मर्म&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;त्वं हि  प्राणाः शरीरे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;बाहु ते तुमि मा शक्ति&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;,&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;हृदये तुमि मा भक्ति&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;तोमाराइ प्रतिमा कडि मंदिरे मंदिरे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;,&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;मातरम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;कमला कमलदलविहारिणी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;वाणी विद्यादयिनी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;नमामि त्वां नमामि कमलाम् अमलाम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;अतुलाम्  सुलजाम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;सुफलाम् मातरम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;श्यामलाम् सरलाम् सुस्मिताम् भुषिताम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;धरणीम् भरणीम्  मातरम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;color:blue;"   &gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:blue;"   lang="HI"&gt;वन्दे  मातरम्&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-size:100%;color:blue;"  &gt;&lt;span style=";color:blue;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:purple;"  &gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-family:Mangal;color:purple;"   lang="HI"&gt;भारत माता की जय  भारत माता की जय  भारत माता की जय   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";color:purple;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;color:purple;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:purple;"  &gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-family:Mangal;color:purple;"   lang="HI"&gt;जय हिंद&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";color:purple;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;color:purple;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:maroon;"  &gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-family:Mangal;color:maroon;"   lang="HI"&gt;धन्याबाद &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Arial;color:maroon;"  &gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-family:Arial;color:maroon;"  &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: center;" class="MsoNormal" align="center"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;color:maroon;"  &gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-family:Mangal;color:maroon;"   lang="HI"&gt;सुभाष काण्डपाल&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Arial;color:maroon;"  &gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-family:Arial;color:maroon;"  &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2308345866569447342-9098169615565015351?l=merinajar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://merinajar.blogspot.com/feeds/9098169615565015351/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2308345866569447342&amp;postID=9098169615565015351' title='1 Comments'/><link rel='edit' 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term='समाज  subhash kandpal uttarakhand'/><title type='text'>हे भगवान् किसी को न दीजो ऐसा बुडापा</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;बात कुछ दिन पहले की है. मैं सुबह घर से अपने ऑफिस के लिए निकलते हुए बस स्टैंड पर पंहुचा. स्टैंड पर काफी भीड़ थी, कई लोग बस से उतर रहे थे तो कई लोग बस में सवार हो रहे थे और कई लोग बस का इंतजार भी कर रहे थे, उन्ही में से एक मैं भी अपनी बस का इन्तजार कर रहा था. मुझे लगभग २-३ मिनट बस की इंतजारी करते हुए हो गया था, लेकिन मैं इन चंद मिनटों के समय में एक चीज ध्यान पूर्वक देख रहा था, एक बुजुर्ग, उम्र लगभग ६०-७० के बीच की, बस स्टैंड पर उपस्स्तिथ सभी लोगों से हाथ जोड़कर विनती कर रहे थे कि कोई उन्हें खाना खिलाये, उन्हें भूख लगी है, उनकी हालत देख कर तो ऐसा लग रहा था कि जैसे उन्होंने काफी समय से भोजन नही किया है, लेकिन किसी भी मुसाफिर ने उनकी तरफ़ देखना तक पसंद नही किया, वह बेचारा, लाचार, भूख प्यास से पीड़ित बुजुर्ग अभी भी इस आश से लोगों से विनती कर रहा था कि कोई जरूर उनकी मदद करेगा, लेकिन शायद दया नामक भावः हमारे ह्रदय में रहा ही न था. जैसे मैं उस बुजुर्ग की ओर आगे बड़ा तभी एक महानुभाव ने उनकी तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि चलो मैं आपको भोजन करवाता हूँ. वो सज्जन उन बुजुर्ग को एक रेडी वाले की दुकान पर ले गए और रेडी वाले से उनके लिए भोजन की थाली को लगाने के लिए कहा. मेरी नजर तो उन बुजुर्ग पर ही थी, मैं तब और भी अचंभित हो गया जब उस दुकानदार ने उस बुजुर्ग को खाना देने से साफ़ मना कर दिया. मेरी समझ में ये नही आ रहा था कि जब वो सज्जन उनको खाना खिलाना चाहता है तो फ़िर वो मना क्यों कर रहा है? उस सज्जन ने बड़े प्रेम से उस रेडी वाले से कहा कि भय्या मैं तुमको पैसे दे रहा हूँ, तुम्हे इनको भोजन खिलाने में क्या परेशानी है? तब रेडी वाला बोलता है कि ये बुड्डा पागल है, ये बार बार यहाँ पर आकर खाना मांगता है, मैं इसको खाना नही दूंगा. उस सज्जन की काफी अनुनय विनय के बाद वो दुकानदार उस बुजुर्ग को खाना देने के लिए तैयार हो गया. उन्होंने उसको पूडी और छोले की थाली दी. थाली में एक पूड़ी और कुछ छोले थे, जैसे ही बुजुर्ग ने थाली में एक पूड़ी देखि तो बिना पूड़ी खाए हुए उन्होंने उस सज्जन से कहा कि मुझे तीन पूडियां और चाहिए. उस ब्यक्ति ने बड़े प्यार से उन बुजुर्ग से कहा कि आपको जितनी पूडिया चाहिए, आपको मिलेगी, आप बड़े आराम से खाईये. बाद में थीं और पूडियां उस बुजुर्ग की थाली में परोशी गई. दुकान दार को पैसे चुकाने के बाद वो सज्जन अपने गंतब्य की ओर प्रस्थान कर गया जबकि बुजुर्ग भोजन का स्वाद ले रहा था और अपनी भूख मिटा रहा था.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;अब सवाल ये है कि क्या वो बुजुर्ग वास्तव में पागल था या भूख ने उसको पागलों जैसा बना दिया था. क्या उस दुकानदार का कहना बिल्कुल उचित था कि यदि इसको खाना देते है तो ये बार बार खाने की मांग करता है?. नही दोस्तों, सोचो यदि हम भूख से बहुत ब्याकुल है और यदि कोई हमें एक टुकडा रोटी को दे तो क्या वो एक रोटी को टुकडा हमारी भूख को तृप्त कर देगा? नही बल्कि वो हमारी भूख को और प्रज्जवलित करेगा जब तक कि हमें भरपेट भोजन न मिल जाय. वही स्तिथि उस बुजुर्ग की भी थी, यदि कोई उसे एक रोटी का टुकडा भी देता होगा तो उससे उसकी भूख शांत नही होती है, बल्कि और भी ज्यादा बदती होगी और इसीलिए वो बार बार खाने की मांग करता होगा. इसलिए दोस्तों मेरी नजर में पागल वो बुजुर्ग नही है, बल्कि उसकी भूख है, जिसने उसको पागलों जैसा बना दिया है. एक अकेला ही ऐसा बुजुर्ग नही है, आपको हजारों लाखों ऐसे कई लोग मिल जायेगे जो अपनी क्षुदा (भूख) पूर्ति करने के लिए पागलों की श्रेणी में गिने जाते है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;धन्य हो ऐसे पुत्र पुत्री जिन्होंने अपने माँ बाप को ऐसी अवस्था में छोड़ दिया है, उनके लिए मेरे पास शब्द नही है और अगर यदि उस बुजुर्ग के पास इस बुडापे के लिए कोई अपना सहारा ही नही है या था तो मैं भगवान् से यही प्रार्थना करूँगा कि हे भगवान् ना दीजो कभी किसी (मुझे) को ऐसा बुडापा. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;तो दोस्तों क्या आप ऐसा बुडापा जीवन ब्यतीत करना चाहेंगे कि आपको २ जून की रोटी के लिए दर दर भटकना पड़े?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;सुभाष काण्डपाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;बद्री केदार उत्तराखंड &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2308345866569447342-1194372023969100412?l=merinajar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://merinajar.blogspot.com/feeds/1194372023969100412/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2308345866569447342&amp;postID=1194372023969100412' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/1194372023969100412'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/1194372023969100412'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://merinajar.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='हे भगवान् किसी को न दीजो ऐसा बुडापा'/><author><name>सुभाष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16711640058971514851</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_7d4LakZ6MDc/R9TxpSMoVeI/AAAAAAAAAOo/OZsIM_AfXo0/S220/sck.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2308345866569447342.post-8082058060307374484</id><published>2008-07-28T03:01:00.000-07:00</published><updated>2008-07-28T03:05:30.093-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='subhash kandpal'/><title type='text'>गिरते नैतिक मूल्य</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;क्यों आज हमारी युवा पीड़ी निरंतर  खोती जा रही है अपने नैतिक मूल्य? इस विषय पर अक्सर बहुत बार चर्चा सुनने को मिलती है, टी वी   न्यूज़ चैनल्स के माध्यम से और समाचार पत्रों के माध्यम से. अगर हम अपने परिवार को लेकर आगे बढें, अपने आस पड़ोस को लेकर आगे बढ़ें तो हम भी इस बात से जरूर इतेफाक रखेंगे कि आज की जो हमारी युवा पीड़ी है और जो युवा पीड़ी आ रही है, उसमे जरूर कही न कहीं नैतिक मूल्यों की कमी नजर आती है, जैसे नैतिक मूल्य हमारे पूर्वजों के थे, हमारे माता पिता के थे. ये जो आज की पीड़ी है जिसमे मैं भी आता हूँ जरूर कही न कही हम अपना नैतिक मूल्य खोते जा रहे है और ये दर नित प्रतिदिन बढती जा रही है. जो संस्कार हमारे पूर्वजों के थे वो संस्कार हम अपनी नई पीड़ी को देने में कामयाब नही हो पा रहे है और मेरी नजर में इसके दोषी भी हम ख़ुद है, हमारा परिवार है, हमारे माँ बाप है. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;अगर मैं अपनी उम्र की युवा पीड़ी को उद्दहरण के तोर पर लेकर आगे बड़ों तो बचपन मैं दादा-दादियों द्वारा हमको अच्छी अच्छी से कहानियाँ सुनने को मिलती थी. कहते है कि जब बच्चा छोटा होता है तो उस समय उसका मस्तिष्क बिल्कुल शून्य होता है, आप उसको जैसे संस्कार और शिक्षा देंगे वो उसी राह पर आगे बढता है. अगर बाल्यकाल में बच्चे को ये शिक्षा दी जाती है कि बेटा चोरी करना बुरा काम है तो वो चोरी करने से पहले सो बार सोचेगा, क्योंकि उसको शिक्षा मिली हुई है कि चोरी करना बुरी बात है. बाल्यकाल में बच्चे को संस्कारित करने में घर के बुजुर्गों का, माता पिता का बहुत बड़ा हाथ होता है. जैसे मैंने कहा कि जब छोटे थे और गाँव के बुजुर्ग दादा-दादियों की संगत में कुछ पल ब्यतीत करते थे, तो वो हमको बहुत कुछ अच्छी अच्छी कहानियाँ सुनाया करते थे जिसका कुछ न कुछ प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क पर पड़ता था, उनमे से कुछ कहानिया प्रेरणादायी होती थी, कुछ परोपकारी होती थी, कुछ जीवों पर दया करने वाली होती थी, कुछ देवी देवितोँ की होती थी और कुछ क्षेत्रीय कहानिया होती थी और सबका उद्देश्य हमारे अन्दर अच्छे संस्कारों को डालने का होता था और जो कि हमें संस्कारित बनाए रखने में आज भी बहुत मदद करते है. आज भी यदि हमारे कदम अपने पथ से विचलित होने का प्रयास करते है तो वो पुरानी कही हुई बातें याद आज जाती है और जो हमें फ़िर से सही पथ पर ले जाने का प्रयास करती है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;मैंने किसी प्रत्रिका मैं पढ़ा था कि किसी ५ साल के बच्चे से किसी सम्मानीय ब्यक्ति ने दुर्गा माँ की फोटो की ओर इशारा करते हुए पूछा बेटा ये कोन है तो बच्चे का जवाब था लोयन वाली औरत, जो इस लोयन के ऊपर बैठी है, किसी दूसरे सम्मानीय ब्यक्ति ने गणेश भगवान् के बारे में पूछा तो बच्चा गणेश जी को...Elephant God.......संबोधित करते हुए पाया गया. अब बताओ इसमे उस बच्चे का कसूर ही क्या है? जब कभी भी उस परिवार के सदस्य ने उसको ये बताने की कोशिश नही की कि बेटा ये दुर्गा माता है जिनका वहां शेर है या ये गणेश भगवान् जी है जिनका मुह हाथी की सूंड जैसा होता है तो उसको कैसे पता चलता?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;जब हम छोटे थे तो हमारे पास एक नैतिक शिक्षा की किताब होती थी जिनमे कि बहुत अच्छी अच्छी कहानिया होती थी जिनको पड़कर बहुत आनंद आता था और एक बार मन में उन जैसा बनने की तीव्र इच्छा होती थी, लेकिन शायद आजकल उस नैतिक शिक्षा की किताब का अर्थ ही बदल गया है, उसका कोई महत्व ही नही रह गया है. मुझे तो लग रहा है कि शायद आज वो नैतिक शिक्षा की किताब स्कूलों से गायब भी हो चुकी होगी.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;आज आपके घरों में दुनिया भर की कोमिक्स का ढेर मिल जाएगा, कंप्यूटर गेम्स की दुनिया भर की सी डी मिल जाएँगी, फिल्मी गानों की दुनिया भर की कैसेट आपके बच्चे के कमरे में मिल जायेगी लेकिन सरदार भगत सिंह, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद आदि मनीषियों की प्रेरणा श्रोत कहानियो की किताब आपके बच्चे के स्कूल बैग से नदारद मिलेगी और यहाँ तक कि आप भी ये कोशिश कभी नही करेंगे कि आप अपने बच्चे को ऐसी किताबें खरीद कर लायें. पहले यदि हमारे माँ बाप ऐसी किताबें नही भी खरीदा करते थे तो इसकी कमी हमारे दादा-दादी और बुजुर्ग पूरा कर देते थे, लेकिन आज हमारे बुरुगों की क्या स्तिथि है ये हम सब लोग जानते है. आज हर माँ बाप की ये कोशिश रहती है कि उनके बच्चे उनके दादा-दादी से दूर रहे, यदि कभी दादा दादी ने बच्चे को डांटने की हिमाकत भी कर ली तो उल्टा उनको उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;शायद ही अब किसी बच्चे को वो दादा दादी की कहानिया सुनने को मिलती होंगी, वो लोरी वो गीत सुनने को मिलते होंगे और शायद न ही कोई माँ बाप के पास इतना समय है कि वो अपने बच्चे को संस्कारित होने के संस्कार दे सकें. आज महात्मा गांधी, भगत सिंह, विवेकनन्द, लाल बहादुर शास्त्री  केवल या तो उनके जन्म दिवस के मोके पर ही याद किए जाते है या उनके निर्वाण दिवस पर, आज वो हमारे घरों से नदारद है, हमारे दादा-दादियों की कहानियो से नदारद है, हमारे माँ बाप की जुबान से  बहुत दूर है, हमारे आस से दूर है और हमारे पड़ोस से दूर है. तो कैसे हम ये आशा कर सकते है कि हमारे बच्चों से अच्छे संस्कार आयें? अच्छे संस्कार देने के लिए हमारे पास तो समय नही है, जो उनको अच्छे संस्कार दे सकते थे उनको तो उपेक्षित किया जाता है, जिन पुस्तकों को पढने से उनको संस्कारित किया जा सकता है उनका स्थान कोमिक्स, खिलोने और कोम्प्टर गेम्स ने ले लिया है, तो कैसे हम ये आश कर सकते है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;इसके बारे में हमको ख़ुद सोचना चाहिए क्योंकि कल हमें भी किसी का माँ / बाप और दादा/दादी  बनना है. हम ये निश्चय करते है कि हमारी संतान किस दिशा में जा रही है और हम उनको क्या संस्कार दे रहे है. इसका और कोई जिम्मेदार नही है, केवल हम ही है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153); font-weight: bold;"&gt;धन्यबाद &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153); font-weight: bold;"&gt;सुभाष काण्डपाल &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153); font-weight: bold;"&gt;बद्री केदार उत्तराखंड &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2308345866569447342-8082058060307374484?l=merinajar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://merinajar.blogspot.com/feeds/8082058060307374484/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2308345866569447342&amp;postID=8082058060307374484' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/8082058060307374484'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/8082058060307374484'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://merinajar.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='गिरते नैतिक मूल्य'/><author><name>सुभाष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16711640058971514851</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_7d4LakZ6MDc/R9TxpSMoVeI/AAAAAAAAAOo/OZsIM_AfXo0/S220/sck.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2308345866569447342.post-687483069760298022</id><published>2008-05-20T07:16:00.001-07:00</published><updated>2008-05-20T07:16:39.414-07:00</updated><title type='text'>क्या यही पशु प्रेम है ??</title><content type='html'>दोस्तो कुछ दिन पहले मेरी नजर किसी दैनिक  समाचार  पत्र पर पढी, समाचार पढने के लिए मेरी थोडी इच्छा जाग्रत हुई, मैं समाचार पत्र पढने लग गया. समाचार संबंधित था एक कुत्ते के बारे मे,जो अपने मालिक को आज लाखों की महीने की आमदनी दे रहा है, दोस्तो ये और कोई कुत्ता नही है, वही है जिसको आप लोग हमेशा विभिन टी वी चैनल्स में विज्ञापन करते हुए देखते आ रहे है, हाँ दोस्तो वही वोडाफोन वाला कुत्ता. समाचार मे मैं आगे क्या पढता हूँ कि किसी एक  पशु प्रेमी स्वयम संस्था ने वोडाफोन कंपनी वालों के इस विज्ञापन पर अदालत मे मुकदमा दायर कर दिया है.  स्वयं सेवी संस्था ने कंपनी पर कुत्ते को उत्प्रीरण करने का आरोप लगाया है. स्वयं सेवी संस्था कहती है कि जब उन्होंने इस विज्ञापन का फिल्माकन किया होगा उस समय कुत्ते को बहुत तकलीफ हुई होगी. दोस्तो मैं उसी स्वयं सेवी संस्था से पूछना चाहता हूँ तब उनका पशु प्रेम कहा गया जब हजारों कुत्ते आए दिन गली मोहलों मे एक टुकड़े रोटी के लिए भटकते रहते है, एक टुकड़े रोटी के लिए अपने आप में लड़ते रहते है, कोई किसी बीमारी से संक्रमित है तो कोई किसी बीमारी से. किसी पर मखियाँ भिन भिना रही है तो कोई किसी गंदे नाले मे अपनी प्यास बुझा रहा है. तब उनका पशु प्रेम कहा गया? तब उनको उनकी पीड़ा नही महसूस हो रही है. ऐसे ही हजारों पालतू पशु हमारी गली गलियों में घुमते हुए नजर आते रहते है. क्या उन्होंने कभी उनके लिए आवाज उठाई?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे आज वो उस कुत्ते की बात कर रहे है जो अपने मालिक के घर मे चारपाई और रजाई के अन्दर सोता है, जो खुशबू दार साबुन से नहाता है, जो वो भोजन करता है जो हम जैसे सामान्य परिवार के लोग नही कर पाते है, उसके लिए करुना भाव का पैदा होना, थोड़ा सा आश्चर्यजनक लगता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तो हो सकता है मैं अपने आप में ग़लत हूँ, मेरे सोचने का तरीका ग़लत हो, लेकिन में उन पशु प्रेमी संस्थाओं से कहना चाहता हूँ कि अगर सच्चे अर्थों में तुमको हमारे पालतू पशुओं की चिंता है तो सबसे पहले उनकी सहायता करो, उनकी सहायता के लिए आगे आओ, जिनको उनकी जरूरत है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2308345866569447342-687483069760298022?l=merinajar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://merinajar.blogspot.com/feeds/687483069760298022/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2308345866569447342&amp;postID=687483069760298022' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/687483069760298022'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/687483069760298022'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://merinajar.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='क्या यही पशु प्रेम है ??'/><author><name>सुभाष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16711640058971514851</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_7d4LakZ6MDc/R9TxpSMoVeI/AAAAAAAAAOo/OZsIM_AfXo0/S220/sck.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2308345866569447342.post-724386111598604925</id><published>2008-04-24T23:38:00.000-07:00</published><updated>2008-04-24T23:50:16.155-07:00</updated><title type='text'>क्या उत्तर पुस्तिका सार्वजनिक होनी चाहिए</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153); font-weight: bold;"&gt;दोस्तो इस विषय के साथ मैं अपने नए ब्लॉग के साथ आप लोगों के बीच में आ रहा हूँ . अपने नये ब्लॉग को मैंने नाम दिया है "नजर". नजर  नाम देने का एक मात्र कारण यह है कि कभी कभी मैं समाचार पत्रों की ओर अपनी नजर फिरा लेता हूँ और बहुत कुछ पढने को मिलता है, कभी कभी मैं ऐसे लेखों से भी होकर गुजरता हूँ जिस पर अपने विचार ब्यक्त करने के लिए मैं लालायित हो जाता हूँ , समाचार पत्रों में मैं अपने विचार तो प्रेषित नही कर सकता हूँ , इसीलिए सोचा इंटरनेट के ब्लॉग माध्यम से आप लोगों के बीच अपने मन के द्वंद को बाटों. वैसे न तो मैं लेखक हूँ और न ही कवि और न ही मुझमे लिखने की कला, बस केवल टूटे-फूटे शब्दों में अपनी बात आप लोगों तक पहुचाना चाहता हूँ . मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप लोग जरूर मुझे मार्गदर्शित करेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 14pt; line-height: 1.3em;"&gt;&lt;span style="color: green;"&gt;दोस्तो  एजुकेशन और कैरियर हमारे जीवन का एक मह्त्वापूर्ण अंग है जो कि हमारा भविष्य तय करते है.  सोचो यदि कोई हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ करे तो इसका परिणाम क्या हो सकता है, हम ख़ुद इसका अंदाजा लगा सकते है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तो बहुत समय सुनने को मिलता है जब कई विद्यार्थी और अन्य प्रतियोगी कहते है कि मेरा फलाना पेपर / परीछा तो बहुत अच्छा गया था, मुझे तो पूरी उमीद थी पास होने की, अच्छे नम्बर आने की फ़िर भी मैं पास नही हुआ या मेरी अच्छी नम्बर नही आयी. मैं मात्र १ या २ नंबर्स से पीछे रहा गया. इस प्रकार के विभिन प्रश्न हमारे मन मस्तिष्क में घुमते रहते है. आख़िर ऐसा क्योँ हुआ? हम इसका कारन ढूढने की कोशिश तो करते है लेकिन कुछ कर नही सकते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तो वैसे कोई भी एक्साम या प्रतियोगिता पास करना हमारी अपनी मेहनत पर निर्भर करता है, जैसी हम मेहनत करेंगे वैसा ही हमको परिणाम मिलेगा, लेकिन कभी कभी हम मेहनत तो पूरी करते है लेकिन उसके अनुसार हमको परिणाम प्राप्त नही होता है. क्योँ हमको इसके अनुसार परिणाम प्राप्त नही होता है, इसके कई दोषी हो सकते है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत बार सुनने को मिलता है कि फलाना बोर्ड की कॉपियाँ कूड़े के ढेर में मिली या अध्यापक के बच्चों को कॉपियाँ जांचते हुए पाया गया या पैसे देकर फलाने ने परीछा में टॉप किया या पैसे में डिग्री खरीदी गई. इस प्रकार की कई खबरें अक्सर सुनने को मिलती है. इसका परिणाम कोण भुगतेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तो मेरा मुख्य विन्दु यह है कि क्या किसी भी परीक्षा या प्रतियोगिता परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिका प्रतियोगी को आवश्यकता पड़ने पर दिखाई देनी चाहिए? क्या अब ऐसा समय आ गया है जब हमको इस प्रकार के कानून की आवश्यकता हो गई है ? क्या हमको ऐसा अधिकार मिलना चाहिए कि हम अपनी उत्तर पुस्तिका का स्वयं मूल्यांकन परिणाम घोषित होने के बाद कर सकें ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तो यदि कोई ऐसा कानून बनता है तो निश्चित ही इसके कई धनात्मक प्रभाव हमारे समाज और सरकारी, निजी तंत्र में देखने को मिलेंगे. सबसे पहला जो लाभ मिलेगा वो है पारदर्शिता की. दूसरा लाभ भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में मदद मिल सकती है, कैसे मिल सकती है , ये बात आप खुद सोच समझ सकते है. इसमे मुझे ज्यादा कुछ लिखने की जरूरत नही है .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा यहा पर लिखने का एक मात्र उद्देश्य यह है कि मैं आप लोगों के विचार भी जानना चाहता हूँ कि क्या वास्तव मे हमको एक ऐसे कानून की जरूरत है, जो हमारे आने वाली युवा पीढ़ी को या हमारे उन प्रतियोगी भाई-बहिनों को ये अधिकार दे कि वे अपने  प्रतियोगी परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं का स्वयं मूल्यांकन कर सके आवश्यकता पड़ने पर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने विचार जरूर देन &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2308345866569447342-724386111598604925?l=merinajar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://merinajar.blogspot.com/feeds/724386111598604925/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2308345866569447342&amp;postID=724386111598604925' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/724386111598604925'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2308345866569447342/posts/default/724386111598604925'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://merinajar.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='क्या उत्तर पुस्तिका सार्वजनिक होनी चाहिए'/><author><name>सुभाष</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16711640058971514851</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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